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दिल्ली: संदिग्ध मुठभेड़ों का इस्तेमाल अपराध पर अंकुश लगाने के तरीके के रूप में नहीं किया जा सकता, अदालत ने की टिप्पणी

Mon, 29 Nov 2021 09:09 PM IST
सुशील कुमार अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

अदालत ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस को एक कठिन और नाजुक कार्य करना पड़ता है, लेकिन ऐसी नाजुक स्थिति से निपटने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। 
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कोर्ट (प्रतीकात्मक तस्वीर।) - फोटो : iStock
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विस्तार
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अदालत ने हिरासत में प्रताड़ना के आरोपों पर पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि संदिग्ध मुठभेड़ों का इस्तेमाल अपराध पर अंकुश लगाने के तरीके के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने मामले में संबंधित डीसीपी द्वारा जवाब दायर न करने पर नाराजगी जताते हुए कहा कि स्पष्ट है कि पुलिस मुठभेड़ के तथ्यों को सामने नहीं लाना चाहती। अदालत ने अपने आदेश की प्रति पुलिस आयुक्त को भेजने का निर्देश देते हुए उन्हें इस मामले में उचित कार्रवाई का निर्देश दिया है।

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मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट विनोद कुमार मीणा ने यह टिप्पणी एक मामले में एक व्यक्ति द्वारा दायर आवेदन पर सुनवाई करते हुए की। याची ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने उसे घर से उठाया व गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखने के बाद कथित मुठभेड़ में पैर में गोली मार दी। अदालत ने कहा यह गहरी चिंता का विषय है, क्योंकि यह एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया है जिसे नागरिकों का रक्षक माना जाता है। यह वर्दी और अधिकार का दुरुपयोग है और ऐसी स्थिति में पीड़ित पूरी तरह से असहाय है। अदालत ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस को एक कठिन और नाजुक कार्य करना पड़ता है, लेकिन ऐसी नाजुक स्थिति से निपटने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। 

उन्होंने कहा किसी भी स्थिति में मानव कानूनी संवैधानिक मौलिक अधिकारों को सभी नागरिकों के संरक्षित किया जाना चाहिए। संदिग्ध मुठभेड़ों को अपराध को नियंत्रित करने के समाधान के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह याद रखना होगा कि इलाज बीमारी से भी बदतर नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि तथ्यों से स्पष्ट है कि संबंधित आरोपी की औपचारिक गिरफ्तारी 13 नवंबर को की गई, हालांकि उसे 2 नवंबर को पुलिस ने गोली मार दी थी। यह प्रतीत होता है कि पुलिस परिवार को सूचित नहीं करना चाहती थी कि क्या हुआ था। परिवार के अनुसार उसे मामले की जानकारी मीडिया के जरिए मिली।
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जांच एजेंसी ने आरोपी को डीडीयू अस्पताल से तिहाड़ जेल में स्थानांतरित होने तक लगभग 11 दिनों तक इंतजार किया। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी भी परस्पर विरोधी और टालमटोल कर जवाब दे रही है। अदालत ने कहा ऐसा प्रतीत होता है कि जांच एजेंसी ने पूरे दिल से कोशिश की है कि मुठभेड़ के तथ्य को सामने न लाया जाए। अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि अधिकारियों ने उन पिछले निर्देश का पालन नहीं किया, जिसमें संबंधित जिला आयुक्त से आरोपों का जवाब देने और रिपोर्ट दर्ज करने को कहा गया है।

इस अदालत के घोर आश्चर्य और अदालत के आदेशों की पूरी अवज्ञा करने के लिए संबंधित डीसीपी ने न तो जवाब दायर किया है। जवाब दो एसपी के हस्ताक्षर युक्त भेजा गया है। इस तरह के उदासीन रवैये और इसके परिणामस्वरूप से स्पष्ट है कि जिला पुलिस के प्रमुख ने न्यायालय के आदेशों की अवज्ञा की है। यह गंभीर चिंता का विषय है जब कोई वरिष्ठ अधिकारी ऐसा करता है तो इससे न्यायिक विवेक और न्यायिक प्राधिकरण के लिए खतरा होता है।

भोजपुरी अभिनेत्री ने दायर की याचिका

भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्री नेहा श्री ने अपने फेसबुक अकांउट के हैक होने को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याची ने अदालत से दिल्ली सरकार और फेसबुक को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपने पेज और अकाउंट तक पहुंच बहाल करने का निर्देश देने की मांग की है। याची ने कहा कि उनके फेसबुक पर हैकर अश्लील फोटो व टिप्पणियां कर उनकी प्रतिष्ठा को खराब कर रहा है।

अभिनेत्री नेहा श्री ने अधिवक्ता कार्तिके माथुर के जरिए दायर याचिका में कहा है कि नेहा श्री ने भोजपुरी और राजस्थानी फिल्मों के साथ-साथ कई टीवी धारावाहिकों में काम किया है और उनके फेसबुक पेज पर उनके 40 लाख से अधिक फॉलोवर है। उन्होंने कहा 19 अक्टूबर की रात को नेहा को फेसबुक से एक ईमेल मिला जिसमें बताया गया कि उसे पेज के एडमिन के पद से हटा दिया गया है।

उनकी मुवक्किला ने मेल मिलने के तुरंत बाद फेसबुक से उसके अकाउंट की हैकिंग के बारे में सूचित करते हुए शिकायत की गई। फेसबुक अकाउंट और याचिकाकर्ता के पेज के हैकर नग्नता, स्पष्ट और अवैध सामग्री प्रकाशित कर रहे हैं, हालांकि फेसबुक पेज के नियंत्रण तक उनकी पहुंच न होने के चलते उनकी शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई।

याचिका में कहा गया है कि चूंकि उन्हें अपनी समस्याओं का कोई समाधान नहीं मिला, इसलिए वे गुरुग्राम और ओखला में कंपनी के कार्यालयों में गई लेकिन दोनों स्थानों पर कोई नहीं मिला। एक सुरक्षाकर्मी ने उसे एक बक्से में अपनी शिकायत छोड़ने को कहा। इसके बाद उसे एक ईमेल मिला जिसमें यह बताया गया कि रिस्पांस टाइम 30 दिन का होगा, लेकिन इसके बाद भी उसकी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया है। याचिका के अनुसार उसने दिल्ली पुलिस के साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन उनके द्वारा भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।

याचिकाकर्ता के फेसबुक पेज पर अवैध और अनैतिक सामग्री की पोस्टिंग याचिकाकर्ता के लिए गंभीर पूर्वाग्रह का कारण बना है और याचिकाकर्ता की प्रतिष्ठा पर चोट किसी भी मुआवजा से पूरी नहीं की जा सकती। उसके फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट की जा रही अनैतिक सामग्री के बारे में दोस्तों, रिश्तेदारों, प्रशंसकों से मेल आ रहे है। उनके बीच याचिकाकर्ता की प्रतिष्ठा बुरी तरह से प्रभावित हुई है।
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साजिश का पता था तो रोकने की कोशिश क्यों नहीं की,,,,

जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद ने सवाल उठाया कि जब पुलिस के पास दंगो के षडयंत्र की पहले ही जानकारी रखने वाला गवाह तो पुलिस ने दंगो को रोकने के लिए कदम क्यों नहीं उठाए। 

अपर सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के समक्ष उमर की ओर से जमानत पर जिरह करते हुए अधिवक्ता त्रिदीप पेस ने कहा कि पुलिस ने तर्क रखा है कि गवाह ने कहा है कि उसे दंगो की जानकारी थी। सवाल यह उठता है कि जब पुलिस को दंगो की जानकारी थी तो उससे निपटने के लिए क्यों नहीं कोई कदम उठाया। स्पष्ट है कि पुलिस की कहानी गलत है और पुलिस ने उनके मुवक्किल को फर्जी मामले में फंसाया गया है। इस मामले में अब सुनवाई 9 दिसंबर को होगी।

अधिवक्ता ने एक गवाह के बयान का जिक्र करते हुए कहा कि गवाह ने कहा है कि वह स्थानीय एसएचओ से नियमित रूप से संपर्क में रहा हैं। वह उन्हें अपडेट रखने के लिए कहते हैं। यदि आप एसएचओ के संपर्क में हैं, तो आपने यह सुनिश्चित क्यों नहीं किया कि कुछ भी नहीं हुआ? क्या यह स्पष्ट नहीं है कि इन गवाहों की खरीद की गई थी? 

उन्होंने कहा इस गवाह ने जनवरी 20 में कुछ समय एसएचओ से मुलाकात की और अधिकारी सब कुछ पहले से जानते थे। जनवरी में गवाह थानाध्यक्ष से मिला इससे स्पष्ट है कि सीलमपुर एसएचओ को सब कुछ पता था। उनके मुवक्किल ने यदि दंगे कैसे कराए? यह जानकारी पहले से होने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई।

अधिवक्ता ने मामले में पुलिस की भूमिका संदिग्ध बताते हुए कहा कि गवाहों के बयानों में दंगा आरोपियों द्वारा भाग लेने के लिए आयोजित गुप्त बैठक के बारे में जिक्र है जिसमें कथित तौर पर दंगों की योजना बनी थी।
उन्होंने कहा एक कानून के खिलाफ वकालत अपराध नहीं है।
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