भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्री नेहा श्री ने अपने फेसबुक अकांउट के हैक होने को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याची ने अदालत से दिल्ली सरकार और फेसबुक को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपने पेज और अकाउंट तक पहुंच बहाल करने का निर्देश देने की मांग की है। याची ने कहा कि उनके फेसबुक पर हैकर अश्लील फोटो व टिप्पणियां कर उनकी प्रतिष्ठा को खराब कर रहा है।
अभिनेत्री नेहा श्री ने अधिवक्ता कार्तिके माथुर के जरिए दायर याचिका में कहा है कि नेहा श्री ने भोजपुरी और राजस्थानी फिल्मों के साथ-साथ कई टीवी धारावाहिकों में काम किया है और उनके फेसबुक पेज पर उनके 40 लाख से अधिक फॉलोवर है। उन्होंने कहा 19 अक्टूबर की रात को नेहा को फेसबुक से एक ईमेल मिला जिसमें बताया गया कि उसे पेज के एडमिन के पद से हटा दिया गया है।
उनकी मुवक्किला ने मेल मिलने के तुरंत बाद फेसबुक से उसके अकाउंट की हैकिंग के बारे में सूचित करते हुए शिकायत की गई। फेसबुक अकाउंट और याचिकाकर्ता के पेज के हैकर नग्नता, स्पष्ट और अवैध सामग्री प्रकाशित कर रहे हैं, हालांकि फेसबुक पेज के नियंत्रण तक उनकी पहुंच न होने के चलते उनकी शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई।
याचिका में कहा गया है कि चूंकि उन्हें अपनी समस्याओं का कोई समाधान नहीं मिला, इसलिए वे गुरुग्राम और ओखला में कंपनी के कार्यालयों में गई लेकिन दोनों स्थानों पर कोई नहीं मिला। एक सुरक्षाकर्मी ने उसे एक बक्से में अपनी शिकायत छोड़ने को कहा। इसके बाद उसे एक ईमेल मिला जिसमें यह बताया गया कि रिस्पांस टाइम 30 दिन का होगा, लेकिन इसके बाद भी उसकी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया है। याचिका के अनुसार उसने दिल्ली पुलिस के साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन उनके द्वारा भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।
याचिकाकर्ता के फेसबुक पेज पर अवैध और अनैतिक सामग्री की पोस्टिंग याचिकाकर्ता के लिए गंभीर पूर्वाग्रह का कारण बना है और याचिकाकर्ता की प्रतिष्ठा पर चोट किसी भी मुआवजा से पूरी नहीं की जा सकती। उसके फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट की जा रही अनैतिक सामग्री के बारे में दोस्तों, रिश्तेदारों, प्रशंसकों से मेल आ रहे है। उनके बीच याचिकाकर्ता की प्रतिष्ठा बुरी तरह से प्रभावित हुई है।
जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद ने सवाल उठाया कि जब पुलिस के पास दंगो के षडयंत्र की पहले ही जानकारी रखने वाला गवाह तो पुलिस ने दंगो को रोकने के लिए कदम क्यों नहीं उठाए।
अपर सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के समक्ष उमर की ओर से जमानत पर जिरह करते हुए अधिवक्ता त्रिदीप पेस ने कहा कि पुलिस ने तर्क रखा है कि गवाह ने कहा है कि उसे दंगो की जानकारी थी। सवाल यह उठता है कि जब पुलिस को दंगो की जानकारी थी तो उससे निपटने के लिए क्यों नहीं कोई कदम उठाया। स्पष्ट है कि पुलिस की कहानी गलत है और पुलिस ने उनके मुवक्किल को फर्जी मामले में फंसाया गया है। इस मामले में अब सुनवाई 9 दिसंबर को होगी।
अधिवक्ता ने एक गवाह के बयान का जिक्र करते हुए कहा कि गवाह ने कहा है कि वह स्थानीय एसएचओ से नियमित रूप से संपर्क में रहा हैं। वह उन्हें अपडेट रखने के लिए कहते हैं। यदि आप एसएचओ के संपर्क में हैं, तो आपने यह सुनिश्चित क्यों नहीं किया कि कुछ भी नहीं हुआ? क्या यह स्पष्ट नहीं है कि इन गवाहों की खरीद की गई थी?
उन्होंने कहा इस गवाह ने जनवरी 20 में कुछ समय एसएचओ से मुलाकात की और अधिकारी सब कुछ पहले से जानते थे। जनवरी में गवाह थानाध्यक्ष से मिला इससे स्पष्ट है कि सीलमपुर एसएचओ को सब कुछ पता था। उनके मुवक्किल ने यदि दंगे कैसे कराए? यह जानकारी पहले से होने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई।
अधिवक्ता ने मामले में पुलिस की भूमिका संदिग्ध बताते हुए कहा कि गवाहों के बयानों में दंगा आरोपियों द्वारा भाग लेने के लिए आयोजित गुप्त बैठक के बारे में जिक्र है जिसमें कथित तौर पर दंगों की योजना बनी थी।
उन्होंने कहा एक कानून के खिलाफ वकालत अपराध नहीं है।