दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कद इतना बड़ा हो गया है कि प्रदेश भाजपा टक्कर देने की स्थिति में नहीं है। यहां तक कि प्रदेश भाजपा के उठाए गए संजीदा सवालों पर भी मुख्यमंत्री का जवाब नहीं आता। प्रदेश का सियासी एजेंडा मुख्यमंत्री तय करते हैं और उनकी पिच पर भाजपा नेता उतरने को मजबूर हो जाते हैं। दिल्ली में आप की रणनीति कुछ वैसी है, जैसी केंद्र में भाजपा की।
एकीकृत निगम होने के बाद केंद्र सरकार की योजनाओं को भी लागू कराने में मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि योजना, प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना, एक राष्ट्र एक राशन कार्ड, आयुष्मान भारत योजना को दिल्ली में भी लागू करने में परेशानी नहीं होगी। इन योजनाओं से भाजपा को एक बड़े वोट बैंक पर कब्जा होने की उम्मीद भी है।
जानकार मान रहे हैं कि एमसीडी को एक करने के पीछे आप की बढ़त को सीमित करने की रणनीति है। दिल्ली में जब एक मेयर होगा और संविधान से उसे ताकत मिलेगी तो उनकी आवाज मुख्यमंत्री के बराबर होगी। अभी तीनों निगमों की समस्याएं अलग-अलग होने से उनके मेयर की एक आवाज नहीं बन पाती। केंद्र सरकार अगर तीनों एमसीडी को एक करती है तो दिल्ली का एक मेयर होगा और एक स्थायी समिति का अध्यक्ष।
इस तरह से एमसीडी की सत्ता भी केंद्रित होगी। इससे भाजपा को भी दिल्ली के मुख्यमंत्री के बराबर के कद का नेता मिल जाएगा। उधर, एमसीडी बराबर आरोप लगाती है कि दिल्ली सरकार फंड रोक कर रखती है। ऐसे में दिल्ली का विकास संभव नहीं हो पाता है। जब एकीकृत एमसीडी थी तो फंड की कमी नहीं थी। ऐसा इसलिए था कि दक्षिणी दिल्ली व उत्तरी दिल्ली एमसीडी से जो भी फंड इकट्ठा होता था उसे पूर्वी दिल्ली एमसीडी को भी समान रूप से वितरित किया जाता है।
एकीकृत एमसीडी के स्थायी समिति नेता का पद शक्तिशाली होता था
एमसीडी जब एकीकृत थी, तब स्थायी समिति के नेता का पद काफी पॉवरफुल होता था। कांग्रेस के दिग्गज नेता राम बाबू शर्मा जब एकीकृत एमसीडी स्थायी समिति के अध्यक्ष थे तो वे तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना और अपनी ही पार्टी की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से कम अधिकार नहीं रखते थे। इसी तरह भाजपा की मेयर शांति देसाई का कद भी तत्कालीन दिल्ली के मुख्यमंत्री से कम नहीं था।
15 साल की सत्ता विरोधी लहर का भी डर
सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2007 में एकीकृत नगर निगम और उसके बाद वर्ष 2012 व 2017 में तीनों नगर निगमों के चुनाव में भारी जीत हासिल करने वाली भाजपा के नेताओं को इस बात का भी डर है कि इस बार जीत मुश्किल न हो जाए। इसकी बड़ी वजह 15 साल की सत्ता विरोधी की लहर मानी जा रही है। अब अगर भाजपा एमसीडी चुनाव हारती है तो निगम के नेताओं के साथ भाजपा के सातों सांसदों की कार्यशैली पर भी सवाल उठेंगे।