दिल्ली विश्वविद्यालय को वर्ष 1931 में वाइस रीगल पैलेस (वर्तमान में राष्ट्रपति) भवन बनने के बाद ही वर्ष 1933 में अपना स्थायी पता मिला था। 1933 में तत्कालीन सरकार ने वाइस रीगल लॉज इस्टेट को डीयू को 3,480 रुपये प्रति वर्ष किराए पर दिया था। इससे पहले तक डीयू के पास अपनी स्थायी भूमि नहीं थी और वह कभी कश्मीरी गेट, अलीपुर रोड, पुराना विधानसभा से संचालित होता रहा। वर्ष 1922 में अस्तित्व में आने के बाद यह 1924 तक कश्मीरी गेट पर स्थित रिट्ज सिनेमा भवन से संचालित होता था।
डीयू आर्काइव्स से जुड़ी रही व दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स में इतिहास की शिक्षिका डॉ. अमृत कौर बसरा ने बताया कि वर्ष 1922 में डीयू अस्तित्व में आ गया था लेकिन उसके पास स्थायी भूमि नहीं थी। तब 1922 से 1924 तक यह कश्मीरी गेट पर रिट्ज सिनेमा भवन से संचालित होता था। तब इस इमारत में काफी छोटा हिस्सा दिया गया था। जबकि इसका मुख्य प्रशासनिक कार्य अंडरहिल हाउस में स्थित था। वर्ष 1924 में एक अक्तूबर को यह अलीपुर रोड स्थित कर्जन हाउस में आ गया।
वर्ष 1924 में विधि संकाय अस्तित्व में आया। डॉ. बसरा बताती हैं कि डीयू के लिए स्थायी भूमि की मांग वर्ष 1927 से उठने लगी थी, लेकिन 1931 तक नहीं दिया गया। 1931 में जब वाइस रीगल पैलेस बन गया तब वाइस राय वहीं रहने लगे। इससे पहले तक सभी वाइस राय डीयू स्थित वाइस रीगल लॉज एस्टेट में ही रहते थे। सर मौरिस ग्वॉयर के 1938 से 1950 तक वाइस चांसलर रहने के बाद डीयू में तेजी से काम शुरू हुए। इसी दौरान कई और कॉलेज डीयू से जुड़े।
भगत सिंह के बम केस का ट्रायल भी वाइस रीगल लॉज में चला
8 अप्रैल, वर्ष 1929 को भगत सिंह और बीके दत्त ने दिल्ली में केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका था और वह गिरफ्तार कर लिए गए। बताया जाता है कि इस बम मामले की सुनवाई वाइस रीगल लॉज में ही हुई थी। भगत सिंह को 12 जून, 1929 को दोषी ठहराया गया था। 23 मार्च 1931 को उन्हें लाहौर जेल में फांसी दी गई थी। कम ही लोगों को पता है कि फांसी देने से पहले डीयू स्थित वाइस रीगल लॉज के तहखाने में बनी एक कोठरी में शहीद भगत सिंह को रखा गया था। मौजूदा समय में तहखाने के ऊपर कुलपति कार्यालय है। यहां एक सुराही, लालटेन, शहीदों के चित्र और खाट को रखा गया है। बताया जाता है कि इस वाइस रीगल लॉज में सुरक्षा के मद्देनजर भी इसे कैंपस के लिए नहीं दिया जाता था।