कानूनी तौर पर अधिकार मिलने के बाद भी ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर चिकित्सीय शिक्षा में गलत शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में चिकित्सीय छात्रों को समलैंगिकता एक बीमारी के रूप में पढ़ाया जा रहा है। यह स्थिति राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के साथ-साथ दूसरे राज्यों में भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर चिकित्सीय शिक्षा में बहुत बदलाव की आवश्यकता है।
जानकारी के अनुसार सप्ताह भर पहले केरल हाईकोर्ट ने दो युवतियों के समलैंगिक जोड़े को एक साथ रहने की अनुमति दी है। इससे पहले भी केरल में समलैंगिकता को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को असंवैधानिक करार देते हुए समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दे दी थी बावजूद इसके एलजीबीटी समुदाय भेदभाव का सामना कर रहा है।
दिल्ली में यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइसेंज के फिजियोलॉजी प्रोफेसर डॉ. सतेंद्र सिंह बताते हैं कि ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए चिकित्सीय पाठ्यक्रम में कई आपत्तिजनक शब्द हैं जिनमें बदलाव होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एमबीबीएस के प्रथम वर्ष के छात्रों को पढ़ाते हुए अक्सर उन्हें यह स्पष्ट करना होता है कि समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि पाठ्यक्रम की नामचीन पुस्तकों में भी इसे एक विकार बताया जाता है।
डॉ. सिंह के अनुसार, इन पुस्तकों में इंटरसेक्स को यौन विकास का विकार बताया जाता है जबकि इंटरसेक्स का मतलब एक ऐसा व्यक्ति जिसमें पुरुष व महिला दोनों की विशेषताएं होती हैं। इनमें बाहरी या आंतरिक प्रजनन अंग, गुणसूत्र पैटर्न इत्यादि शामिल हो सकते हैं। यह एक यौन अंतर है न कि कोई बीमारी है। वहीं एम्स के एमबीबीएस चतुर्थ वर्ष के एक छात्र बताते हैं कि समाज का एक बड़ा तबका समलैंगिक लोगों को न तो सामान्य मानता है और न ही उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता है। वे खुद किताबों में समलैंगिकता को यौन विकृति के रूप में पढ़ रहे हैं। इस पूरे मसले पर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) की ओर से टिप्पणी नहीं की गई।
दरअसल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के प्रमुख मेडिकल कॉलेज एम्स, यूसीएमएस, आरएमएल और लेडी हार्डिंग के अलावा मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर भी इससे सहमत हैं कि पाठ्यक्रम में तत्काल बदलाव की आवश्यकता है। इनमें से कुछ प्रोफेसर ने मिलकर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को लिखित शिकायत भी की। इसके बाद सभी मेडिकल कॉलेजों के लिए दिशा निर्देश भी जारी किए गए, डॉक्टरों का कहना है कि इस पर ध्यान नहीं दिया गया।
एनएमसी के निर्देश नाकाफी
एनएमसी के एक सदस्य ने कहा, यह मामला संज्ञान में है। पिछले वर्ष ही सभी मेडिकल कॉलेज और पाठ्य पुस्तकों से जुड़े प्रकाशकों को निर्देश दिए थे कि पुस्तकों में कौमार्य को लेकर अवैज्ञानिक जानकारी है इसलिए स्नातक और स्नातकोत्तर चिकित्सीय छात्रों को पढ़ाते समय इसे इस तरह से पढ़ाया जाए कि यह इस समुदाय के लिए किसी भी तरह से अपमानजनक नहीं होना चाहिए। डॉक्टरों का कहना है कि यह निर्देश नाकाफी हैं क्योंकि इसके बाद भी मेडिकल कॉलेजों में कोई बदलाव नहीं हुआ। साथ ही एनएमसी ने एक समिति का गठन किया था जिसमें इस समुदाय का एक भी प्रतिनिधि मौजूद नहीं था।