हिंदी सिर्फ भाषा नहीं है, बल्कि संस्कृति व प्रकृति से जुड़ाव भी है। सरल व सपाट होने के कारण यह जनमानस की भावना को एक-दूसरे तक पहुंचाने में भी सक्षम है। इसका दायरा विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि सभी क्षेत्रों में इसका व्यापक रूप देखने को मिलता है। विज्ञान की पृष्ठभूमि से होने के बावजूद पर्यावरण जुड़े विशेषज्ञों ने अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के तहत अपने विचारों को साझा किया।
हिंदी अपने आप में एक आकर्षक भाषा है...
मेरी प्राथमिक शिक्षा केंद्रीय विद्यालय से हुई। वहां भाषा पर बारीकी से काम से होता है और बच्चों को समझाया व पढ़ाया जाता है। हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि यह तो संस्कृति व प्रकृति को आपस में जोड़ने का काम करती है। हिंदी में अब किताबें कम हो गई हैं और लोग अंग्रेजी की तरफ बढ़ रहे हैं। इससे हिंदी की बोलचाल व लिखने में भी कमी आई है। जब तक हम हिंदी में बोलेंगे या पढ़ेंगे नहीं, तब तक हिंदी का विस्तार नहीं हो सकता। हिंदी अपने आप में एक आकर्षक भाषा है, बशर्ते इसे सरल रूप से लिखा जाए। तभी एक आम आदमी इस भाषा की खूबी यानी सरलता को समझ सकता है। कई बार हिंदी में कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है कि समझना मुश्किल होता है। ऐसे शब्दों के बारे में लोगों को सही अर्थ की जानकारी नहीं होती है। मैं विज्ञान की पृष्ठभूमि से होने के बाद भी हिंदी को प्रमुख तौर पर तवज्जो देती हूं। हिंदी में बात करने से आप सामने वाले को सहज महसूस करा सकते हैं, जो किसी अन्य भाषा में करना मुश्किल है।
- डॉ. सोनाली घोष, निदेशक, राष्ट्रीय प्राणी उद्यान
बोलचाल की भाषा के लिए हमें दिल बड़ा करना होगा...
हिंदी में जितनी सरलता है, उतनी किसी अन्य भाषा में नहीं है। मैं वन्यजीवों के साथ काम करते हुए हिंदी में ही अन्य कर्मचारियों से संवाद करता हूं। हिंदी एक आम भाषा है। स्थानीय भाषा, उर्दू व अन्य भाषाएं भी इससे मिल जाती हैं। तब यह लोगों तक पहुंच बनाती है। बोलचाल की भाषा के लिए हमें दिल बड़ा करना होगा। हमें इसके शब्दकोश पर भी काम करने की आवश्यकता है। शब्दों का चयन ऐसा हो कि आम आदमी इस भाषा की सरलता को समझ सके। हमने पारिस्थितिकी तंत्र पर भी हिंदी में वेबिनार की थी। इसमें हिंदी के साधारण शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। विज्ञान को हमेशा अंग्रेजों की दृष्टि से देखा गया है। हिंदी में इसका अधिक प्रचलन नहीं हो सका। ऐसे में वैज्ञानिक दृष्टि से इसमें अधिक काम करने की आवश्यकता है।
- डॉ. फैयाज खुदसर, पर्यावरण विशेषज्ञ