नई दिल्ली। मुस्लिम समुदाय के विवाह को भी विशेष विवाह अधिनियम (एसएमए) के तहत पंजीकृत करने का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। याची ने कहा उन्हें अनिवार्य विवाह आदेश के तहत ऐसा करने का विकल्प नहीं दिया जा रहा है जिसमें बिना किसी देरी के तत्काल पंजीकरण का प्रावधान है। अदालत ने इस मुद्दे पर दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने एनजीओ धनक फॉर ह्यूमैनिटी और एक प्रभावित व्यक्ति की याचिका पर नोटिस जारी कर दिल्ली सरकार को तीन सप्ताह में अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। इस मामले में अब चार अक्तूबर को सुनवाई होगी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील उत्कर्ष सिंह ने कहा कि मुस्लिम शादियों को अनिवार्य शादी आदेश से बाहर रखना भेदभावपूर्ण है। अदालत ने उनके तर्क पर सहमति जताते हुए दिल्ली सरकार के वकील से कहा कि आप भेदभाव नहीं कर सकते। दिल्ली सरकार की ओर से पेश वकील शादान फरासत ने कहा कि वह मामले में सरकार से निर्देश लेकर अपना पक्ष रखेंगे।
याचिका में कहा गया है कि दूसरे याचिकाकर्ता की शादी एक मुस्लिम शादी है न कि अंतर जातीय विवाह लेकिन इसके बावजूद दंपति को एसएमए के तहत 30 दिन का नोटिस दिया गया। यह दंपति दिल्ली में शादी करने के लिए अपने गृह नगर से भागकर आया था।
उन्होंने कहा दिल्ली सरकार विशेष रूप से अनिवार्य पंजीकरण विवाह आदेश 2014 के तहत मुस्लिम विवाह के पंजीकरण की अनुमति नहीं दे रही जबकि वह एक दिन के भीतर विवाह रजिस्टर करने के लिए बाध्य है।
उन्होंने कहा कि सरकार का यह व्यवहार याची के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। विशेष विवाह अधिनियम के तहत 30 दिनों की नोटिस अवधि की आवश्यकता किसी अन्य स्थान से आने वाले व्यक्ति के लिए बहुत बोझिल प्रक्रिया है। उन्होंने अदालत से सरकार को उनके मुवक्किल का पंजीकरण तुरंत करने का निर्देश देने का आग्रह किया।