जामिया मिलिया इस्लामिया एलुमनाई एसोसिएशन के अध्यक्ष शिफा-उर-रहमान ने मंगलवार को तर्क रखा कि केवल प्रदर्शनकारी होना कोई अपराध नहीं है और हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है। रहमान ने दिल्ली दंगों के एक मामले में अपनी जमानत पर सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तर्क रखा। इतना ही नहीं उसने अधूरी जांच पर मुकदमा चलाने की मंजूरी पर भी सवाल उठाया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के समक्ष रहमान की ओर से पेश अधिवक्ता अभिषेक सिंह ने तर्क रखा कि किसी संस्था का सदस्य या एएजेएमआई का हिस्सा होना कोई अपराध नहीं है। प्रदर्शनकारी होना कोई अपराध नहीं है। एक व्यक्ति अपनी राय का हकदार है। जेसीसी का सदस्य होना कोई अपराध नहीं है। जेसीसी एक व्हाट्सएप ग्रुप है।
उन्होंने कहा रहमान के खिलाफ यूएपीए के तहत मुकदमा चलाने के लिए केंद्र और दिल्ली सरकार द्वारा जारी स्वीकृति आदेश एक शून्य है। उन्होंने कहा मंजूरी देना आरोप पत्र दाखिल करने या मामले में संज्ञान लेने के लिए एक पूर्वापेक्षा है। उन्होंने कहा मुकदमा चलाने की मंजूरी एकत्रित साक्ष्यों की समीक्षा के बाद दी जानी चाहिए थी।
सवाल यह उठता है कि क्या इस तरह की स्वतंत्र समीक्षा की जा सकती है यदि जांच आधी हुई हो। उन्होंने कहा यदि जांच ही पूरी नहीं हुई तो मुकदमें की मंजूरी कैसे दी जा सकती है। अधिवक्ता ने कहा कि 31 जुलाई, 2020 को यदि जांच पूरी नहीं हुई थी तो जांच की स्वतंत्र समीक्षा कैसे हो सकती थी? उन्हें सबूत कैसे प्रदान किए गए थे? इस तारीख तक यदि जांच पूरी नहीं हुई तो इसे एक जांच रिपोर्ट कैसे मान सकते है।