हाईकोर्ट ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण सस्ती शिक्षा प्रदान करने वाले पर्याप्त मेडिकल कॉलेजों की कमी के कारण छात्रों को विदेशों में अध्ययन के लिए मजबूर होना पड़ता है। अदालत ने यूक्रेन का हवाला देते हुए कहा, यह वास्तविकता चिंता का कारण है। रूस से संघर्ष के कारण यूक्रेन से मेडिकल के हजारों छात्रों को वापस लाया गया है और उन्होंने कॉलेजों में अपनी सीटें गंवा दी हैं।
न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने संतोष मेडिकल कॉलेज में स्नातकोत्तर और स्नातक पाठ्यक्रमों में सीटें बढ़ाने की अनुमति देते हुए यह टिप्पणी की। इन कॉलेजों को संतोष ट्रस्ट द्वारा संचालित किया जा रहा है।
अदालत ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि अधिकारियों को नियमों के तहत निर्धारित मानकों को कम करने के लिए नहीं कहा जा सकता है, लेकिन साथ ही वर्तमान जैसी स्थिति में जब यह पाया जाता है कि याचिकाकर्ता जैसा संस्थान 20 से अधिक समय से चल रहा है। वर्षों से किसी भी बुनियादी ढांचे की कमी नहीं है।
इसके अलावा कोविड -19 महामारी के कारण प्रारंभिक निरीक्षण के समय पाई गई कमियों को भी ठीक किया है यह भी जनहित के खिलाफ होगा कि याचिकाकर्ता को सीटें बढ़ाने की अनुमति से इनकार किया जाए।
अदालत ने कहा ऐसे समय में जब देश की जनसंख्या की तुलना में चिकित्सा पेशे का अनुपात बेहद कम है पीजी और यूजी सीटों की संख्या में वृद्धि निश्चित रूप से देश के चिकित्सा बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लक्ष्य में योगदान देगी।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के दो आदेश खारिज
अदालत ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के दो आदेशों को खारिज करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि संस्थान को एमएस (प्रसूति एवं स्त्री रोग) में सीटों को 4 से बढ़ाकर 7 करने की अनुमति दी जाए। इसी प्रकार एमएस (ऑर्थोपेडिक्स) में 3 सीटों को 7 करने और एमबीबीएस कोर्स में 100 को 150 सीटें करने का निर्देश दिया है।
याचिका में एनएमसी द्वारा जारी किए गए अस्वीकृति पत्रों को चुनौती दी गई थी, जिसमें बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड बैचलर ऑफ सर्जरी (एमबीबीएस) पाठ्यक्रम और एमएस (प्रसूति एवं स्त्री रोग) के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में संस्थान में सीटों की वृद्धि के लिए याचिकाकर्ताओं के अनुरोध को खारिज कर दिया गया था।