फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी : पति-पत्नी परिवार के दो स्तंभ, एक टूट जाए तो ढह जाता है घर

Tue, 03 May 2022 05:36 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

तलाक के खिलाफ पति की अपील खारिज करते हुए अदालत ने की टिप्पणी। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता के आचरण से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि उसने जानबूझकर सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और परिवार न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं किया। अपीलकर्ता पति का कथन है कि उसे केवल पेंशन मिल रही है और उसके पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है।
 
विज्ञापन
दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

पति और पत्नी परिवार के दो स्तंभ हैं। वे एक साथ किसी भी स्थिति से निपट सकते हैं और परिवार को सभी परिस्थितियों में संतुलित कर सकते हैं। यदि एक स्तंभ कमजोर या टूट जाता है, तो पूरा घर ढह जाता है। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी पति के व्यवहार को लेकर पत्नी को प्रदान तलाक संबंधित फैमिली कोर्ट के फैसले को उचित ठहराते हुए की है।

विज्ञापन


कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की खंडपीठ ने पति की अपील को खारिज करते हुए तलख टिप्पणी करते हुए कहा कि पति इस न्यायालय के विभिन्न आदेशों का पालन करने में विफल रहा है। उसने सर्वोच्च न्यायालय और परिवार न्यायालय ने भरण-पोषण के भुगतान के लिए और बकाया भरण-पोषण राशि का भुगतान करने के बजाय तुच्छ मुकदमों में लिप्त होना पसंद किया। पीठ ने कहा, अपीलकर्ता को इस अदालत द्वारा रखरखाव राशि जमा करने का निर्देश दिया गया था, जिसमें विफल रहने पर अपीलकर्ता को परिणाम भुगतना होगा। इसलिए हमारा विचार है कि फैमिली कोर्ट का अपीलकर्ता के बचाव को खारिज करना न्यायोचित था।

पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता के आचरण से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि उसने जानबूझकर सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और परिवार न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं किया। अपीलकर्ता पति का कथन है कि उसे केवल पेंशन मिल रही है और उसके पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है।
विज्ञापन


ये है मामला
पेश मामले के अनुसार, दोनों का विवाह 22 मई 1997 को हुआ और उनकी दो बेटियां हैं। शादी के कुछ समय बाद दोनों के रिश्ते में खटास आ गई। पति द्वारा की गई क्रूरता के निरंतर कृत्यों के आधार पर पत्नी द्वारा पार्टियों के बीच वैवाहिक मतभेद और तलाक की याचिका को प्राथमिकता दी गई। फैमिली कोर्ट ने अपीलकर्ता पति के खिलाफ तलाक की याचिका को स्वीकार कर लिया।

अपीलकर्ता ने तब उक्त फैसले को चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि फैमिली कोर्ट ने पति के बचाव को खारिज करने और उसे अपने बचाव के सुबूत पेश करने की अनुमति नहीं दी थी और पत्नी के आरोपों पर भरोसा करके तलाक दे दिया।

बेटियों की जिम्मेदारी और परिवार के खर्चों में दिलचस्पी नहीं
पीठ ने उसके तर्क को खारिज करते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि अपीलकर्ता को अपनी बेटियों की जिम्मेदारी लेने और परिवार के खर्चों में योगदान देने में कोई दिलचस्पी नहीं है। पीठ ने पाया कि पति ने घर, उसकी नौकरी और बच्चों की देखभाल के लिए पत्नी पर पूरा बोझ डाल दिया और उसने कोई जिम्मेदारी नहीं ली। वहीं, पत्नी को लगातार गालियां दी और उसका व उसके परिवार का अपमान किया। 

अपीलकर्ता ने पत्नी के चरित्र पर संदेह किया। पत्नी को तलाक देने के लिए पैसे की मांग की। वह एक पति के रूप में और विशेष रूप से एक पिता के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहा। इस न्यायालय और परिवार के निर्देशों के बाद भी अपीलकर्ता ने अपनी कमाई के बारे में गलत बताया और अपनी बेटियों के लिए भरण-पोषण का भुगतान करने में विफल रहा। प्रथम दृष्टया यह घरेलू हिंसा का मामला है।

विज्ञापन

दूसरी शादी के मुद्दे पर कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

मुस्लिम व्यक्ति को दूसरी शादी करने से पहले अपनी पत्नी से लिखित अनुमति लेना जरूरी है और इसके अमल में लाने के लिए कानून बनाने की मांग की गई है। उच्च न्यायालय ने इस मुद्दे को लेकर एक महिला द्वारा दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला की खंडपीठ ने प्रतिवादियों को छह सप्ताह के भीतर अपना हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हुए सुनवाई 23 अगस्त तय की है। अधिवक्ता बजरंग वत्स के माध्यम से महिला रेशमा ने केंद्र सरकार को शरीयत कानून के तहत एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा अनुबंधित द्विविवाह या बहुविवाह को विनियमित करने के लिए कानून बनाने  के लिए निर्देश देने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि एक पति अपनी सभी पत्नियों को समान रूप से बनाए रखने के लिए बाध्य है। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें