हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी की जमानत के स्तर पर अदालतों का यह निष्कर्ष निकालना कि उसका शादी का वादा झूठा या बदनीयती से था, न तो उचित है और न ही व्यवहारपूर्ण। इस तरह का निर्णय सुनवाई के दौरान पक्षकारों के पेश सबूतों का पूरी तरह से मूल्यांकन करने के बाद किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने यह टिप्पणी करते हुए एक 20 वर्षीय युवक को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष कथित घटनाओं के समय बालिग थे और रिश्ते में थे। यह उनके परिवारों को भी पता था। ऐसा भी नहीं है कि दोनों के माता-पिता उनकी शादी करने पर विचार कर रहे थे।
अदालत ने कहा ऐसा लगता है कि प्रस्तावित विवाह उन दोनों की शिक्षा पूरी होने की प्रतीक्षा कर रहा था। इसलिए इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता का लड़की से किया गया विवाह का कथित वादा प्रथम दृष्टया झूठा था यह इसे बदनीयती से किया गया था।
युवक के खिलाफ आईपीसी धारा 376 व 377 के तहत वर्ष 2021 में आरोप लगाते हुए मामला दर्ज किया गया था। वह एक साल सात महीने से न्यायिक हिरासत में था। पुलिस ने उसके खिलाफ 10 दिसंबर, 2021 को आरोप पत्र दाखिल किया था। निचली अदालत ने उसके खिलाफ दुष्कर्म के आरोप के तहत आरोप तय किए थे और उसे अप्राकृतिक यौनाचार के आरोप से मुक्त कर दिया था।
आरोपी ने कहा था कि वह और शिकायतकर्ता लड़की बालिग हैं और सहपाठी थे। दोनों दो साल से रिश्ते में थे। उनके खिलाफ मामला इसलिए दर्ज किया गया था क्योंकि उनकी शादी का प्रस्ताव टूट गया था।