दिल्ली हाईकोर्ट ने तलाक मामलों में गुजारा-भत्ता कानून में मौजूद खामियों पर चिंता जताते हुए कहा कि इनकी वजह से अपराध करने वाला पक्ष अक्सर बच निकलता है। कोर्ट ने यह बात एक व्यक्ति द्वारा अपनी ‘पत्नी’ को गुजारा भत्ता देने का एक आदेश रद्द करते हुए कही। मामले में महिला-पुरुष पहले से विवाहित थे, उनके पहले साथी जीवित थे और विवाह कानूनी रूप से बना हुआ था। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे में मौजूदा कानून के अनुसार दूसरी पत्नी का विवाह अमान्य हो जाता है, वह कानूनन विवाहित पत्नी नहीं कही जा सकती।
इस मामले में पुरुष ने 1999 में महिला से हिंदू रीति से विवाह किया था। 2011 सितंबर में महिला ने फैमिली कोर्ट में गुजारे भत्ते का आवेदन किया। पुरुष को आदेश हुआ कि वह महिला को 4,200 रुपए महीना गुजारा भत्ता चुकाए। पुरुष ने हाईकोर्ट में अपील कर खुलासा किया कि वह और महिला, दोनों पहले से विवाहित थे। ऐसे में उनका विवाह वैध नहीं हो सकता, महिला को कानूनन उसकी पत्नी नहीं कहा जा सकता।
इस आधार पर गुजारा भत्ता देने का आदेश गलत है। जस्टिस सुब्रमोनियम प्रसाद ने निचली अदालत के आदेश के खिलाफ की गई इस अपील को सही माना। उन्होंने कहा कि वे निश्चित तौर पर महिला की स्थिति से सहानुभूति रखते हैं, लेकिन मौजूदा कानून के अनुसार गुजारा भत्ता जारी नहीं रखा जा सकता। सीआरपीसी की धारा 125 में ऐसी स्थिति पर विचार नहीं किया गया, जिनमें महिला-पुरुष पहले से विवाहित हों और उनके साथी जीवित हों और नए विवाह के आधार पर गुजारा-भत्ते की मांग की जाए।
शोषण रोकने में नाकाम कानून
हाईकोर्ट ने कहा कि सामाजिक न्याय की बात धारा 125 में कही गई है, लेकिन यह शोषण रोकने में विफल नजर आती है। कई महिलाओं के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। खासतौर से गरीब तबके की महिलाओं को अक्सर इस प्रकार के अत्याचार व शोषण से गुजरना होता है, लेकिन कानूनी खामी की वजह से अपराधी पक्ष बच निकलता है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि विचाराधीन मामले में अगर महिला चाहे तो सामने आए तथ्यों के अनुसार कानूनी कार्रवाई कर सकती है, वह घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत भी मुआवजा मांग सकती है।