उच्च न्यायालय ने सोमवार को केंद्र से वैवाहिक दुष्कर्म को अपराधीकरण के मुद्दे पर सैद्धांतिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामले में केंद्र को सैद्धांतिक रूप से हां या ना कहना होगा क्योंकि अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे कितना भी विचार-विमर्श करें यह समाप्त होने वाला नहीं है।
न्यायमूर्ति राजीव शकधर व न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की पीठ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। पीठ ने कहा केंद्र को इस मुद्दे पर हां या ना कहना होगा जैसे कि वर्तमान एक जैसे मुद्दों में विचार-विमर्श समाप्त नहीं होता है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत के सामने कम चर्चा और परामर्श की स्थिति रखना उचित नहीं होगा और परामर्श की प्रक्रिया शुरू करने के लिए समय की आवश्यकता है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा हमें अपना स्टैंड तैयार करना होगा और अपने आधिपत्य के लिए अपना सुविचारित स्टैंड रखना होगा। यह मामला 2015 का है।
अदालत ने उन्हें समय प्रदान करते हुए कहा हमें इससे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उन्हें निर्णय लेना होगा कि वे किस रास्ते पर जा रहे हैं।
केंद्र ने 13 जनवरी को उच्च न्यायालय को बताया था कि वह वैवाहिक दुष्कर्म के अपराधीकरण के मुद्दे पर एक रचनात्मक दृष्टिकोण पर विचार कर रहा है और आपराधिक कानून में व्यापक संशोधन पर कई हितधारकों और अधिकारियों से सुझाव मांगा है।
केंद्र सरकार की स्थायी वकील मोनिका अरोड़ा ने पीठ को बताया था कि केंद्र आपराधिक कानून में संशोधन का एक व्यापक कार्य कर रहा है जिसमें आईपीसी की धारा 375 (दुष्कर्म) शामिल है।
गृह मंत्रालय में अवर सचिव ने दायर अपने अतिरिक्त हलफनामे में कहा था कि इस मामले को पहले ही सीज कर लिया गया है और यह कि वैवाहिक बलात्कार अपवाद को याचिकाकर्ताओं के कहने पर ही प्राकृतिक सिद्धांतों के रूप में समाप्त नहीं किया जा सकता। न्याय के लिए 'सभी हितधारकों की बड़ी सुनवाई' की आवश्यकता है।
पीठ एनजीओ आरआईटी फाउंडेशन, ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन्स एसोसिएशन, एक पुरुष और एक महिला द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें भारतीय दुष्कर्म कानून के तहत पतियों को दिए गए अपवाद को खत्म करने की मांग की गई है।
अदालत ने कहा कि मामले में एक उदासीन रवैया होना चाहिए और वैवाहिक दुष्कर्म के अपराधीकरण के मुद्दे को प्रथम दृष्टया अधिनियम के नजरिए से देखा जाना चाहिए न कि विवाहित या अविवाहित महिला के।
न्याय मित्र के रूप में अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने कहा कि वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद को बनाए रखने का कोई कारण नहीं है।
न्याय मित्र ने तर्क दिया कि एक विवाहित को अपने पति पर मुकदमा चलाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है यदि वह मानती है कि उसके साथ दुष्कर्म किया गया है और वैवाहिक संबंध से इनकार करने के मामले में पति या पत्नी के समक्ष उपाय बहाली के लिए याचिका दायर करना है और खुद को उस पर मजबूर नहीं करना है।