याची ने पति पर यह आरोप लगाया गया है कि उसने करीब एक दशक से कोई पैसा नहीं दिया है और याचिकाकर्ता और उनके बच्चे के रखरखाव के लिए तय 31 लाख रुपये से अधिक का बकाया है। बच्चे उसी के पास है।
जीवन छोटा है और फालतू के मामलों में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। उच्च न्यायालय ने सोमवार को वैवाहिक विवाद के पक्षकारों को मामले को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाने के लिए प्रोत्साहित करते हुए उक्त टिप्पणी की।
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न्यायमूर्ति नजमी वजीरी याचिकाकर्ता पर्ल अरोड़ा द्वारा अपने पति रोहित अरोड़ा के खिलाफ दायर अवमानना मामले की सुनवाई कर रहे है। याची ने पति पर यह आरोप लगाया गया है कि उसने करीब एक दशक से कोई पैसा नहीं दिया है और याचिकाकर्ता और उनके बच्चे के रखरखाव के लिए तय 31 लाख रुपये से अधिक का बकाया है। बच्चे उसी के पास है।
दूसरी ओर पति ने कहा कि वे करीब 24,63,000 रुपये का भुगतान कर चुका है और उन पर मात्र 7.50 लाख रुपये बकाया है। उन्होंने कहा कुछ वित्तीय कठिनाई के कारण वे भुगतान नहीं कर पाए और वे वर्तमान में 2 लाख रुपये का भुगतान करने को तैयार है। वहीं याची ने कहा वह एक जानलेवा बीमारी से पीड़ित है।
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अदालत ने दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद कहा कि जिंदगी बहुत छोटी है...इसका मतलब कोर्ट में केस चलाने से ज्यादा है। दोनों पक्षों के बीच 18 अदालती मामले लंबित हैं ऐसे में वे संवाद कर मामले को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाएं। अदालत ने कहा फालतू के मामलों में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। अदालत ने संबंधित वकीलों को पक्षों से निर्देश लेने का निर्देश दिया ताकि प्रभावी आदेश पारित किया जा सकें।