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मोबाइल से सावधान: बच्चों को घेर रही सिरदर्द, अनिद्रा और मधुमेह जैसी बीमारियां, जानिए इसकी वजह

Fri, 18 Nov 2022 07:53 AM IST
Digvijay Singh अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

फरीदाबाद के बीके अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास गोयल का कहना है कि कोरोना काल में बच्चों में मोबाइल की लत तेजी से बढ़ने का सबसे असर आंखों पर पड़ा है। ओपीडी में अब भी ज्यादा मरीज आंख से जुड़ी शिकायत लेकर आ रहे हैं।
 
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मोबाइल की लत। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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मौजूदा दौर में मोबाइल ने बेशक जिंदगी को सरल और आसान बनाया है। लेकिन इसके हद से ज्यादा बढ़ते इस्तेमाल का असर सेहत पर पड़ रहा है। इस वजह से बच्चे मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और चिडचिड़ेपन के शिकार हो रहे हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि अब तो बड़ी संख्या में नोमोफोबिया मतलब नो मोबाइल फोन फोबिया से पीड़ित भी इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। इससे पीड़ित शख्स में मोबाइल फोन कनेक्टिविटी से अलग होने का डर रहता है।

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परिवार भी हो जाता है आर्थिक तंगी का शिकार
सफदरजंग अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. मनुश्री गुप्ता ने बताया कि मोबाइल की वजह से घंटों एक ही जगह बैठे रहने से मोटापा बढ़ता है। साथ ही मानसिक व अन्य बीमारियां भी पैदा होती हैं। दूसरी तरफ ऑनलाइन गेम व जुए की आदत से परिवार भी आर्थिक तंगी का भी शिकार हो जाता है। मोबाइल के कारण वह अपनी सामान्य जिंदगी को भूलकर एक अलग ही जिंदगी में रहता है। 

फरीदाबाद के बीके अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास गोयल का कहना है कि कोरोना काल में बच्चों में मोबाइल की लत तेजी से बढ़ने का सबसे असर आंखों पर पड़ा है। ओपीडी में अब भी ज्यादा मरीज आंख से जुड़ी शिकायत लेकर आ रहे हैं। वहीं, बच्चों के पढ़ाई कौशल, संवाद, आपसी व्यवहार में झिझक समेत दूसरी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अजय भार्गव बताते हैं कि कोरोना काल में बच्चों के मानसिक विकास पर असर पड़ा है। इसमें पहली बार सामूहिक अवसाद, अनिश्चय का माहौल बना। बच्चे घरों में थे। खेल नहीं पा रहे थे। उनका अधिकतम वक्त मोबाइल पर गुजरता था। इसका दुष्प्रभाव अब दिखने लगा है। कुछ बच्चों में शारीरिक व मानसिक विकास बाधित रहा।

बच्चों पर अध्ययन
फरीदाबाद में स्कूल हेल्थ योजना के तहत जनवरी से अभी तक 5 से 8 वर्ष के करीब 50,000 बच्चों की स्क्रीनिंग की गई।
ब्लैक बोर्ड पर धुंधला दिखने की समस्या, संवाद करने में झिझक, बौद्धिक क्षमता भी कम।
स्कूल हेल्थ योजना की ओपीडी में हर दिन औसतन दो बच्चे ऐसे आ रहे हैं, जिनको सामान्य बोलचाल की भाषा भी नहीं समझ में आ रही है। स्कूल हेल्थ प्रोग्राम की डॉ. वंदना बताती हैं कि कोविड काल में बच्चों का ज्यादातर समय मोबाइल-टीवी में ही गुजरा है। इस वक्त दिखने वाली दिक्कतों की बड़ी वजह बच्चों को मोबाइल लती हो जाना है।


 

केस-1
कोविड काल में स्कूल बंद थे। 17 साल का किशोर समय काटने के लिए मोबाइल गेम खेलने लगा। उसकी यह आदत कुछ दिन में लत बन गई और वह रोज 16-17 घंटे कमरे में बैठकर गेम खेलता था। माता-पिता या दोस्तों से दूरी बनाने लगा। दिन भर की शारीरिक गतिविधियां बंद होने के कारण वह मोटापे का शिकार हो गया। इससे उसके शरीर में अन्य बीमारियां भी घर करने लगी। साथ ही मानसिक रूप से भी बीमार हो गया। इसकी तस्दीक सफदरजंग अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग के वरिष्ठ डॉ. मनुश्री गुप्ता ने की है।

 
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केस- 2
इंजीनियरिंग में दाखिला लेने के बाद पिता ने बेटे को लैपटॉप और स्मार्टफोन दे दिया। हॉस्टल में उसका रहना था और हाथ में लैपटाप। रोक-टोक भी नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि वह दिन-रात ऑनलाइन रहने लगा। पूरे दो सेमेस्टर वह घर नहीं गया। कोई क्लास नहीं ली। खुद को उसने हॉस्टल के कमरे में कैद रखा। पिता को इस बात का इल्म तब हुआ, जब कॉलेज से फोन आया। बताया गया कि न फीस जमा है, न सेमेस्टर एक्जाम ही दिया है। आनन-फानन में वह हॉस्टल पहुंचे। उनको यह देखकर ताज्जुब हुआ कि लैपटॉप लिए वहां मौजूद था। वह बच्चे को लेकर एम्स पहुंचे। फिलहाल एम्स के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. यतन पाल सिंह बल्हारा की निगरानी में इलाज चल रहा है।
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