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गांव की बात : दल्लूपुरा के आंगन में आबाद हुए दिल्ली और नोएडा, खुद किराएदारों के भरोसे

Wed, 28 Jul 2021 05:57 AM IST
दुष्यंत शर्मा आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली

सार

  • अपनी 2000 बीघा खेती की जमीन दे दी और अब पूरा गांव खुद किरायेदारों के भरोसे
  • मौजूदा समय में पूरा गांव बाजार में तब्दील हो गया है
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गांव के एक चौपाल में बैठे लोग... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पूर्वी दिल्ली के दल्लूपुरा गांव ने दिल्ली और नोएडा दोनों को आबाद किया है। इस गांव ने अपनी 2000 बीघा खेती की जमीनें दिल्ली और नोएडा को दे दीं और अब पूरा गांव खुद किरायेदारों के भरोसे जीवनयापन करने को मजबूर है। मौजूदा समय में पूरा गांव बाजार में तब्दील हो गया है। किरायेदारों की सहूलियत के लिए स्थानीय लोगों ने घरों में दुकानें खोल ली हैं।

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करीब 800 साल पुराना यह गांव गुर्जरों का है। दिल्ली के संस्थापक राजा अनंगपाल के लिए इस गांव के लोगों में अत्यधिक सम्मान है। गांव के लोग खुद को उनका वंशज मानते हैं। दल्लूपुरा दिल्ली में गुर्जरों के उन 24 गांवों में से एक है, जिनकी श्याम गिरी बाबा में सर्वाधिक आस्था है। दल्लूपुरा गांव का एक छोर हिंडन-यमुना नहर से सटा है, तो दूसरा छोर नोएडा सीमा से सटा है। दल्लूपुरा के निवासी शीशपाल बताते हैं कि पहले यह गांव ब्राह्मणों का था, लेकिन वे यहां से प्रयागराज चले गए। बाद में इस गांव में गुर्जरों ने डेरा डाला और यहीं के हो गए।

दलहन-तिलहन और गन्ना पैदा होता था
दल्लूपुरा में दलहन-तिलहन से लेकर गन्ने की भी खूब खेती होती थी। जगत सिंह बताते हैं कि नहर का किनारा होने के कारण यहां 10-12 फुट तक लंबे गन्ने होते थे। ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, मटर, गेहूं, सरसों और अरहर भी पैदा होता था, लेकिन गांव की आधी जमीनें पहले दिल्ली सरकार ने अधिग्रहीत कर लीं और 1980 तक बचे खेत नोएडा में चले गए।
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दिल्ली जाने के लिए शाहदरा से मिलता था तांगा
दल्लूपुरा के बुजुर्ग करन सिंह ने बताया कि उनके बचपन में दिल्ली जाने के लिए कड़कड़डूमा के रास्ते पहले शाहदरा जाना पड़ता था, फिर वहां से दिल्ली के लिए इक्का या फिर तांगा मिलता था। शाहदरा तक करीब 12 किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था। लोहा पुल को पार करके दिल्ली जाते थे। 

दल्लूपुरा की जमीन पर दो बड़ी कॉलोनियां बसीं
दल्लूपुरा की जमीन पर आज दो बड़ी कॉलोनियां बस चुकी हैं। वसुंधरा एन्क्लेव और दुर्गा पार्क कॉलोनी के अलावा धर्मशिला अस्पताल, चिल्ला खेल परिसर दल्लूपुरा की जमीन पर बना है। गांव वालों को इस बात का मलाल है कि उनके गांव में बने खेल परिसर का नाम चिल्ला गांव के नाम पर आखिर क्यों रखा गया है।

जितना पुराना गांव, उतना पुराना पीपल का पेड़
दल्लूपुरा गांव में पीपल चौक पर पीपल का पेेड़ उतना ही पुराना है, जितना पुराना यह गांव है। जगत सिंह ने बताया कि आसपास कितनी बार लोगों के घर बने-बिगड़े, लेकिन पीपल को सुरक्षित रखा गया, जबकि गांव के प्राचीन खेड़ा देवर मंदिर का बीते साल जीर्णोद्धार कराया गया है। यह गांव के कुल देवता का मंदिर है। 
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ग्रामीण बोले...
दिल्ली के गांव को जो सुविधाएं मिलनी चाहिए, ऐसी कोई सुविधा गांव के पास नहीं है, आज न ही गांव रहे और न शहर बन पाए।
- जगत सिंह

दल्लूपुरा के लोग कई साल से पानी की समस्या सेे जूझ रहे हैं। गांव में राजनीतिक लोगों की कमी नहीं है, लेकिन जल समस्या का समाधान नहीं हो रहा।
- वेद प्रकाश, प्रधान

बाबूजी रतनपाल जिन्होंने गुर्जरों का इतिहास लिखा, वह दल्लूपुरा में ही पैदा हुए थे। गांव में आज भी उनके वंशज हैं, उनका बड़ा सम्मान है।
- करन सिंह

राजा अनंगपाल को हम अपना राजा मानते हैं, उनसे जुड़ी कहानियां आज भी बच्चों को सुनाई जाती हैं। 
- शीश पाल

हमारे बच्चे बेरोजगार घूम रहे हैं। गांव के अधिकतर घरों का खर्च किरायेदारों की बदौलत ही चल रहा है। 
- रनवीर

हिंडन-यमुना नहर का पानी इतना साफ होता था कि सिंचाई के साथ-साथ इसे पीने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था। अब जरूरत भर पानी नहीं मिल पा रहा।
- अजब सिंह

बचपन में हम नहर में नहाने जाते थे, तो साथ में पानी भरकर घर भी लाते थे। नहर के पानी से ही भोजन बनता था।
- सिंह राज
 

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