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दिल्ली : अदालत का आदेश- सार्वजनिक स्थलों पर ट्रांसजेंडर के लिए बनाए जाएं अलग शौचालय

Fri, 22 Apr 2022 06:02 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

अदालत ने दिल्ली सरकार को राजधानी में नए बनने वाले शौचालयों में ट्रांसजेंडरों के लिए अलग से सुविधा सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। पीठ ने मामले की सुनवाई के लिए 29 जुलाई की तारीख तय की है।
 
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दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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उच्च न्यायालय ने सार्वजनिक स्थानों पर ट्रांसजेंडरों के लिए अलग शौचालय न होने पर चिंता जताई है। अदालत ने दिल्ली सरकार को राजधानी में नए बनने वाले शौचालयों में ट्रांसजेंडरों के लिए अलग से सुविधा सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। पीठ ने मामले की सुनवाई के लिए 29 जुलाई की तारीख तय की है।

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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार को यह बताने के लिए कहा है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग शौचालय बनाने के लिए अब तक क्या कदम उठाए हैं। राजधानी में अब तक ट्रांसजेंडरों के लिए बनाए गए शौचालयों की संख्या कितनी है। यह भी स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि नए बनाए जा रहे सार्वजनिक स्थानों पर ट्रांसजेंडरों के लिए अलग शौचालय का निर्माण किया जा रहा है या नहीं। यदि ऐसा नहीं है तो उचित कारणों सहित जवाब प्रदान करे।

अदालत ने पूछा- क्या धर्मगुरु वीरेंद्र देव के आश्रम को बाल विकास विभाग संभाल सकता है
उच्च न्यायालय ने  दिल्ली में फरार धर्मगुरु वीरेंद्र देव दीक्षित के आश्रम पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा है कि वहां रहने वाली महिलाएं अमानवीय जीवन को सहन कर रही हैं। इसके बावजूद यह स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट इन तथ्यों से आंखें नहीं मूंद सकता।
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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी व न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने कहा है कि  क्या महिला एवं बाल विकास विभाग आश्रम की व्यवस्था  संभालने के लिए तैयार हैं। यह भी कहा है कि यह राष्ट्रीय राजधानी में हो रहा है और अकेला मामला नहीं है,  जहां एक बाबा पर दुष्कर्म का आरोप लगाया गया है। अदालत का कहना है कि किसी बालिग व्यक्ति को उसके माता-पिता के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकता और न ही वह ऐसा करने को तैयार है । 

पीठ ने यह आदेश  दिल्ली के रोहिणी स्थित आश्रम में रहने वाली महिलाओं से जुड़ी दो याचिकाओं पर दिए हैं। मंगलवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि प्रथम दृष्टया उसका विचार है कि संस्था का संचालन दिल्ली सरकार को सौंप दिया जाए। आज संस्था की ओर से पेश वकील ने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोप झूठे हैं और क्योंकि वे एक अल्पसंख्यक संस्थान हैं, जिनके अनुयायियों की अपनी मान्यताएं हैं वे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित हैं। हम ब्रह्मा कुमारियों की एक शाखा हैं। अगर वे मौजूद हो सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? दीक्षित देश को आध्यात्मिक सशक्तीकरण की ओर ले गए हैं और इसलिए ये महिलाएं यहां हैं। वे इसे अपना घर और अपना मंदिर मानते हैं।

जजों के पार्किंग स्टिकर के दुरुपयोग पर उच्च न्यायालय सख्त
उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को गलत तरीके से अपने वाहनों पर जज शब्द के स्टीकर लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने इस मामले में उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल और तीस हजारी न्यायालयों के प्रधान न्यायाधीश को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। जनहित याचिका में ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश देने का आग्रह किया गया है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला की खंडपीठ ने  प्रतिवादियों से ऐसे स्टिकर का उपयोग करने वाले लोगों के उदाहरणों पर विशेष रूप से प्रतिक्रिया देने के लिए कहा है। अधिवक्ता संसेर पाल सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि उन्होंने कई वाहन देखे हैं जो इन प्रिंटआउट के साथ-साथ अपने वाहनों पर जज पार्किंग स्टिकर का उपयोग कर रहे हैं। जबकि वे न्यायिक सेवाओं से संबंधित नहीं हैं। याचिका में कहा गया है कि यह अदालतों द्वारा जारी दिशा-निर्देशों और सर्कुलर का उल्लंघन है। इनका उपयोग भी सुरक्षा के लिए खतरा है। क्योंकि ऐसे वाहनों को चेकिंग के लिए कोर्ट गेट पर नहीं रोका जाता है। इस मामले में वह कई बार उच्चन्यायालय से लेकर अन्य स्तरों पर शिकायत कर चुके हैं। लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। 

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