न्यायाधीश ने बचाव पक्ष के वकील की उस दलील पर आपत्ति जताई कि गवाह विश्वास के योग्य नहीं हैं और वे तैयार किए गए हैं क्योंकि उनके बयान कथित घटना की तारीख के एक महीने के बाद दर्ज किए गए। न्यायाधीश ने कहा कि दंगों के बाद भी कई दिनों तक भय का माहौल रहा और सरकारी गवाह जांच एजेंसी के सामने अपने बयान दर्ज कराने को लेकर डरे हुए थे।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 11 अक्तूबर को अपने आदेश में कहा कि इन परिस्थितियों को देखते हुए इस चरण में आकर इन वकीलों के बयान पर सिर्फ इसलिए विश्वास नहीं जताना और अभियोजन पक्ष के मुकदमे को खारिज करना न्याय की हत्या करना होगा कि गवाहों के बयान एक महीने के बाद दर्ज कराए गए थे।
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को अवगत कराया कि नौ आरोपियों ने बड़े जनसमूह को भय और आतंकग्रस्त कर समाज में वैमनस्य पैदा किया और उनके काम ना सिर्फ राष्ट्रविरोधी थे बल्कि दिल्ली में कानून के नियमों के खिलाफ भी थे।
बचाव पक्ष ने तर्क रखा कि घटना 25 फरवरी 20 की है लेकिन अभियोजन पक्ष द्वारा पेश सीसीटीवी फुटेज इस दिन की नहीं है। हालांकि सरकारी वकील ने कहा कि उनका केस सीसीटीवी वीडियो फुटेज पर आधारित नहीं है बल्कि रिकॉर्ड में दर्ज अन्य सबूतों पर आधारित है। इनमें गवाहों द्वारा आंखों देखी घटना का दर्ज बयान भी है।
अदालत ने सभी तथ्यों को देखने के बाद कहा कि सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 147 (दंगा), 148 (दंगे, घातक हथियार से लैस), 149 (गैरकानूनी सभा), 380 (चोरी), 436 (आगजनी), 452 (घर में जबरन घुसने) के तहत प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं।