अदालत ने दिल्ली दंगों के एक और मामले में पुलिस की जांच पर सवाल उठाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब एक मामले में आरोपी को समान धाराओं के आरोप से बरी कर दिया गया है तो उसके खिलाफ पुन: उन्हीं धाराओं में कैसे मुकदमा लगाया जा सकता है। अदालत ने ऐसे ही एक मामले में सुनवाई करते हुए उक्त टिप्पणी करते हुए पुलिस से जवाब मांगा है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने कहा कि दूसरे मामले में अभियुक्तों के खिलाफ कार्रवाई कैसे जारी रखी जा सकती है, कानून में यह सवाल अनिवार्य रूप से उठता है। 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही अदालत ने दिल्ली पुलिस से एक ही शिकायत में दो आरोपपत्र दायर करने के लिए पुलिस को रिपोर्ट पेश करने का निर्देश है। अदालत ने कहा कानूनी सिद्धांत कि एक व्यक्ति पर एक ही अपराध के लिए एक ही अधिकार क्षेत्र में दो बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।
यह मामला दंगा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामलों में दो आरोपपत्र से संबंधित हैं। अदालत जीशान नाम के एक व्यक्ति और सात अन्य लोगों द्वारा दर्ज प्राथमिकी से संबंधित है। एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि एक अलग मामले में जीशान की इसी शिकायत को 16 अन्य लोगों के साथ भी शामिल किया गया है। अदालत ने एक मामले में तीन आरोपियों को दयालपुर थाने में दर्ज मामले में दो सितंबर को बरी कर दिया था।
पुलिस ने जीशान की इसी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की थी। मामले की दोबारा जांच की गई और आरोपपत्र दाखिल किया गया। अदालत ने विशेष लोक अभियोजक से सवाल पूछा कि वर्तमान आरोप पत्र पर कैसे सुनवाई की जा सकती है और यह कानून के तहत कैसे सही है।
उन्होंने सरकारी वकील को कानून के इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण देने को कहा कि आखिर दूसरे मामले में अभियुक्तों के खिलाफ कार्रवाई कैसे जारी रह सकती है, जब उन्हें एक ही अधिकार क्षेत्र में अपराध की समान धाराओं के लिए पहले मामले में बरी कर दिया गया हो।
विशेष लोक अभियोजक डीके भाटिया ने अदालत से इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण पेश करने का लिए समय प्रदान करने का आग्रह किया। अदालत ने मामले की सुनवाई 9 सितंबर तय कर दी।
दो सितंबर को अदालत ने शाह आलम, राशिद सैफी और शादाब के खिलाफ दायर आरोपपत्र में खामियों पर पुलिस को फटकार लगाते हुए उन्हें आरोपमुक्त कर दिया था।
एक मामले में कांग्रेस के पूर्व पाषर्द ताहिर हुसैन भी आरोपी है।