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अवैध निर्माण के खिलाफ ब्लैकमेलिंग याचिका की मंजूरी नहीं : हाईकोर्ट

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नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने बिना किसी जानकारी के संपत्तियों को कथित अनधिकृत निर्माण बताने की जनहित याचिका को ‘ब्लैकमेलिंग प्रकार की मुकदमेबाजी’ करार दिया है। अदालत ने याची पर 50 हजार रुपये जुर्माना लगाते हुए कहा कि किसी भी हालत में इस प्रकार की ब्लैकमेलिंग याचिका को दायर करने की मंजूूरी प्रदान नहीं की जा सकती।
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मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति अमित बंसल की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि याचिका बिना किसी होमवर्क के दायर की गई। ये मात्र कुछ लोगों के कहने पर दायर कर दी गई कि अवैध निर्माण हो रहा है। पीठ ने कहा यह ऐसा तरीका नहीं है जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा जनहित याचिका दायर की जा सके।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्तियों से उसे अवैध निर्माण के बारे में पता लगा था। पीठ ने कहा यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जब भी किसी भी संपत्ति को ध्वस्त किया जाता है भले ही वह प्रकृति में अवैध हो, ऐसे में याचिकाकर्ता को संबंधित संपत्ति के मालिक या कब्जाधारियों को पक्ष बनाना जरूरी है। कोई भी निर्माण बिना सुनवाई के ध्वस्त नहीं किया जा सकता है।
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फाइट फॉर राइट सोशल वेलफेयर सोसाइटी द्वारा दायर याचिका में शास्त्री नगर इलाके की कुछ संपत्तियों को अनधिकृत और अवैध निर्माण बताते हुए आरोप लगाया गया था कि संबंधित विभाग उन्हें तोड़ नहीं रहा।
मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा इस कोर्ट रूम का आकार क्या है? क्या आप इसे देख सकते हैं और हमें बता सकते हैं? वकील के बताने में असमर्थता व्यक्त करने पर अदालत ने कहा कि आप उस कमरे का आकार नहीं बता सकते जिसमें आप खड़े हैं, लेकिन आप एक इमारत को देख सकते हैं और बता सकते हैं कि यह अधिकृत है या नहीं?
अदालत की टिप्पणी पर याची ने कहा कि उसे तब आसपास रहने वाले व्यक्तियों ने बताया है कि निर्माण अवैध है। अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि आप यह भी स्पष्ट नहीं कर पा रहे कि याचिकाकर्ता ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत उक्त 13 भवनों के बारे में कभी कोई सूचना प्राप्त की है। याची ने यह प्रयास नहीं किया है कि संबंधित प्रतिवादी अधिकारियों या किसी सक्षम प्राधिकारी से निर्माण के नक्शे आदि के बारे में कोई भी जानकारी प्राप्त करें।
पीठ ने कहा ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक जनहित याचिका नहीं है। यह एक ब्लैकमेलिंग प्रकार का मुकदमा है। अदालत ने याची पर 50 हजार रुपये जुर्माना करते हुए उसे यह राशि चार सप्ताह में दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में करवाने का निर्देश दिया है।
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