दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष दलील दी कि उपहार त्रासदी मामले में सुबूतों से छेड़छाड़ मामले में सुनवाई में देरी करने के लिए रियल एस्टेट व्यवसायी सुशील और गोपाल अंसल की तरफ से हर संभव प्रयास किए गए। अब वे अपने सात साल की सजा के निलंबन के लिए लिए बुढ़ापे को आधार नहीं बना सकते हैं।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद सबूतों से छेड़छाड़ मामले में उनकी सात साल की जेल की सजा के निलंबन संबंधी अंसल की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने कहा कि निचली अदालत के रिकॉर्ड की डिजिटल प्रति को सुनवाई की अगली तारीख 14 जनवरी से पहले उच्च न्यायालय के समक्ष रखा जाना चाहिए। दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता डी. कृष्णन ने तर्क दिया कि मुकदमे में देरी करने के लिए हर संभव प्रयास किए गए थे।
बारबार अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गई थी ताकि सुनवाई आगे बढ़े और दोषी ठहराए जाने के बाद अंसल अपनी सजा के निलंबन के लिए बुढ़ापे का आधार नहीं ले सके। पुलिस ने पहले उच्च न्यायालय को बताया था कि उसे सीओवीआईडी-19 महामारी की तीसरी लहर के कारण अंसल बंधुओं की रिहाई पर गंभीर आपत्ति है। तर्क दिया कि अपराध की प्रकृति ऐसी थी कि इसने पूरी प्रणाली को खतरे में डाल दिया।
अदालत ने पहले उनकी उम्र और कोविड-19 की स्थिति को देखते हुए उन्हें अंतरिम आधार पर रिहा करने का सुझाव दिया था जबकि निचली अदालत से दोष साबित होने के खिलाफ उनकी अपील पर फैसला करने को कहा था। महामारी की पिछली दो लहरों के दौरान भी जिन अपराधों के लिए दोनों याचिकाकर्ताओं को दोषी ठहराया गया था, उन्हें सप्रीम कोर्ट की एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति की ओर से पारित निर्देशों के संदर्भ में जमानत पर रिहा किया गया था। पिछले साल तीन दिसंबर को एक सत्र अदालत ने सबूतों से छेड़छाड़ मामले में उनकी दोष सिद्धि और जेल की सजा को निलंबित करने की अंसल की याचिका को खारिज करते हुए जमानत पर रिहा करने से इनकार कर दिया था।
इसके बाद अंसल ने उच्च न्यायालय का रुख किया। इस मामले में दिल्ली पुलिस और शिकायतकर्ता, उपहार त्रासदी पीड़ितों के संघ (एवीयूटी) से जवाब मांगा था। सुशील अंसल का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद निगम ने तर्क दिया था कि कटे-फटे दस्तावेज मुख्य उपहार मुकदमे में उनके दोष को साबित करने के लिए प्रासंगिक भी नहीं थे और सबूतों से छेड़छाड़ मामले में उनकी सजा न्याय का उपहास था।
उन्होंने कहा कि सुशील अंसल 80 वर्ष से अधिक आयु के है और बीमारियों से पीड़ित थे। गोपाल अंसल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने यह भी तर्क दिया था कि मुवक्किल की उम्र 70 वर्ष से अधिक है, इसलिए उन्हें रिहा करने के लिए अपने व्यापक और उदार रवैया अपनाना चाहिए। उपहार सिनेमा में 13 जून, 1997 को हिंदी फिल्म 'बॉर्डर' की स्क्रीनिंग के दौरान लगी भयंकर आगे में 59 लोगों की जान चली गई थी।