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तो क्या सिर्फ सलाहकार हैं मुख्यमंत्री केजरीवाल?

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दिल्ली में चुनी हुई सत्तर विधायकों वाली सरकार है। लेकिन मुख्यमंत्री महज सिर्फ एक सलाहकार हैं। जमीन, सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस के मामले में उपराज्यपाल को मुख्यमंत्री से सलाह लेने की भी जरूरत नहीं है। उपराज्यपाल के पास इस बात का यह विशेषाधिकार है कि वह कोई भी मामला राष्ट्रपति के पास भेजने के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।
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संविधान, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम और कार्यप्रणाली संबंधी नियम, 1993 के सभी प्रावधानों के मुताबिक दिल्ली में मुख्यमंत्री बिना उपराज्यपाल को सूचना दिए कैबिनेट की बैठक भी नहीं बुला सकते।

अगर कैबिनेट ने कोई फैसला ले भी लिया तो बिना उपराज्यपाल के अंतिम मुहर के उसे लागू नहीं किया जा सकता। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपराज्यपाल नजीब जंग के बीच शुरू पावर जंग में संविधान व कानूनी प्रावधानों के हिसाब से उपराज्यपाल का पलड़ा भारी है। मुख्यमंत्री चाहकर भी मनमर्जी नहीं चला सकते।
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फैसलों पर उपराज्यपाल की सहमति जरूरी

फैसलों को अंतिम रूप देने के लिए उपराज्यपाल की सहमति जरूरी है। उन्हीं शक्तियों का इस्तेमाल करके दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के सर्किल रेट के फैसले को उपराज्यपाल रहते हुए तत्कालीन उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना ने मानने से इनकार कर दिया था। जिसे बाद में बदलना पड़ा।

दिल्ली सरकार से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं मुख्यमंत्री के सचिव की तरफ से सभी विभाग प्रमुखों को भेजी गई चिट्ठी या आदेश को अधिकार क्षेत्र के बाहर माना जा रहा है।

अगर सरकार का आदेश होता तो मुख्य सचिव इस तरह का आदेश विभाग प्रमुखों को देते। हालांकि मुख्यमंत्री का हवाला देकर सचिव राजेंद्र कुमार के आदेश को लेकर विभाग प्रमुखों में असमंजस की स्थिति है। आखिर मुख्यमंत्री कार्यालय का आदेश माने या फिर उपराज्यपाल के निर्देशों का पालन करके सभी फाइलें वहीं भेजें?

वहीं दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जो संविधान, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम और कार्यप्रणाली संबंधी नियम, 1993 में जो लिखा है, वहीं मानेंगे। उनके अनुसार नियम 23 में  लिखा है कि क्या उपराज्यपाल को भेजा जाना है।
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