सन 1724 से 1734 ईस्वी के मध्य हुआ था निर्माण
जंतर मंतर में स्थित वृहद खगोलीय यंत्र विश्व की असाधारण कृतियों में से एक है। इनसे प्राचीन खगोलीय संस्थाओं के अंतिम स्वरूप के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। इसका निर्माण आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय (1724-1734) में कराया था। उन्होंने सबसे पहले प्रथम वेधशाला का निर्माण दिल्ली में किया गया था। इसके बाद जयपुर, उज्जैन, वाराणसी व मथुरा में वेध शालाओं का निर्माण किया था, इसमें मथुरा की वेधशाला काफी पहले ही नष्ट हो चुकी है। मिश्र यंत्र की मान्यता है कि इसका निर्माण जयसिंह के पुत्र महाराजा माधो सिंह ने (1751-68) द्वारा कराया था।
उपग्रह की भी मिलेगी जानकारी
स्मारक में पर चार यंत्र मौजूद हैं। इसमें जयप्रकाश यंत्र का व्यास लगभग 6.33 मीटर है। इसका उपयोग खगोलीय पिंडों, स्थानीय समय व राशिवलयों का समन्वयात्मकता मापने के लिए किया जाता था। मिश्र यंत्र अंतरराष्ट्रीय समय दर्शाता है। इसमें जापान, आइलैंड, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड का समय देखा जा सकता था। वहीं, सम्राट यंत्र एशिया की सबसे बड़ी धूप घड़ी है। इससे राजा महाराजा ध्रुव तारा भी देखा करते थे। इसी तरह राम यंत्र ग्रह व उपग्रह के बारे में जानकारी देता था। स्मारक के सहायक संरक्षण अधिकारी ने बताया कि इसका कार्य कुछ माह में पूरा होने की उम्मीद है।