रेलवे परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण के खिलाफ रेलवे यूनियन ने मोर्चा खोल दिया है। यूनियन ने कहा है कि इस मेगा सार्वजनिक बिक्री की नीति को कामयाब नहीं होने देंगे। यह निर्णय राष्ट्र और समान रूप से रेल कर्मचारियों के हित में नहीं है। रेलवे ट्रेनों को निजी संस्थाओं को सौंपने जा रही है। इसके विरोध में यूनियन ने 13 से 18 सितंबर के दौरान विरोध सप्ताह मना कर निरंतर संघर्ष की शुरुआत करेगा। बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और रैलियां आयोजित करने का आह्वान किया है।
नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवेमेन के महामंत्री डॉ. एम रघुवईया ने कहा है कि सरकार द्वारा घोषित मुद्रीकरण नीति सरकार के प्रभार के तहत मेगा सार्वजनिक संपतियों की बिक्री को इंगित करती है। जिसमें भारतीय रेलवे सहित सभी प्रमुख क्षेत्र जैसे सड़क परिवहन, बिजली, दूरसंचार, भंडारण, खनन, विमानन, बंदरगाह, स्टेडियम शामिल हैं। यहां तक कि अर्बन रियल एस्टेट को भी नहीं छोड़ा गया है। नीति बनाते समय सरकार इस तथ्य को सरकार भूल गई कि ये महत्वपूर्ण संपति देश की है और किसी की व्यक्तिगत नहीं है।
एनएफआईआर ने भारत सरकार की कार्रवाई को जन विरोधी, गरीब विरोधी बताया है और कहा है कि देश के नागरिकों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। रघुवईया ने यह भी कहा है कि सरकार भारतीय रेलवे की भूमिका को पहचानने में विफल रही है जो राष्ट्र की जीवन रेखा है क्योंकि यह सभी वर्गों के लोगों को अधिक महत्वपूर्ण रूप से देश के गरीबों और दलितों को सेवाएं प्रदान कर रही है।
फेडरेशन के मीडिया प्रभारी सोमनाथ मलिक ने कहा कि सरकार को याद होना चाहिए कि भारत के 2.30 करोड़ से अधिक लोग प्रतिदिन रेलवे ट्रेनों से यात्रा करते हैं। भारतीय रेलवे ने वर्ष 2021-22 में कोविड- 19 महामारी के बीच 1233 मिलियन टन से अधिक माल ढुलाई करके महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है और पूरे राष्ट्र में निर्वाध आपूर्ति लाइन सुनिश्चित की है। भारतीय रेलवे और उसके कार्यबल को पुरस्कृत करने के बजाय, सरकार का इरादा कुछ व्यक्तिगत हो गया है। मुद्रीकरण का सहारा लेना कही से उचित नहीं है। 13 सितंबर से पूरे देश में रेल कर्मी विरोध दर्ज कराएंगे।