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हाईकोर्ट के फैसले के बाद की गतिविधियों पर भी एसआईटी की नजर

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नोएडा। एमराल्ड मामले में वर्ष 2014 में हाईकोर्ट के फैसले के बाद की गतिविधियों पर भी एसआईटी की नजर है। एसआईटी की जांच में 2014 से 2021 तक की गतिविधियों पर भी सवाल उठाए जाएंगे। पहले दिन मांगी गई जानकारी के बाद ऐसे संकेत मिल रहे हैं। इससे पहले 2017 तक इस मामले में लिप्त अधिकारियों को चिह्नित करने को कहा गया था। लेकिन ऐसा लग रहा कि अब मामला थोड़ा आगे बढ़ गया है। कोर्ट की तल्ख टिप्पणी के बाद नोएडा प्राधिकरण के अलावा प्रदेश सरकार की भी काफी किरकिरी हुई है। शासन इस मामले में बेहद सख्त है।
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दरअसल, 2014 में हाईकोर्ट की ओर से एमेराल्ड कोर्ट के 40 मंजिला ट्विन टावर को गिराने आदेश आया था। इसके बाद बिल्डर सुप्रीम कोर्ट चला गया और वहां उसने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर कर दी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद मामले में बिल्डर को राहत मिल गई और ट्विन टावर को ध्वस्त करने पर रोक लग गई। इसके बाद के दो-तीन वर्षों में दूसरी कई प्रकार की अन्य गतिविधियों में खरीदारों को प्रोजेक्ट शिफ्ट करने और पैसे वापस लेने का विकल्प मिला। करीब 133 फ्लैट खरीदार दूसरे प्रोजेक्ट में शिफ्ट हो गए। 248 ने पैसे वापस ले लिए। 252 खरीदार फ्लैट के लिए सुप्रीम कोर्ट में लड़ते रहे।
यहां सवाल यह उठ रहा है कि 2014 से 2021 तक नोएडा प्राधिकरण की ओर से कोर्ट के मामले में किस तरह का रूख रहा। प्राधिकरण की ओर से कोर्ट के मामले में किसी तरह की लापरवाही तो नहीं की गई। इस तरह की संभावनाओं की तलाश भी एसआईटी करेगी। प्राधिकरण की सीईओ की ओर से भी बताया गया था कि कोर्ट में होने वाले जिरह के बारे में उन्हें नहीं बताया गया। इसकी जानकारी उनको नहीं थी। इस मामले में वकील को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। वहीं कोर्ट में मामला देखने के लिए नियुक्त किए गए प्रबंधक पर प्राधिकरण ने चार्जशीट दाखिल की है। इस मामले में शासन ने प्रबंधक को निलंबित भी कर दिया है।
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