ब्रजेश पाठक के मुताबिक, आज बच्चों के चहुंमुखी विकास की जरूरत है। देश-दुनिया में क्या हो रहा है, उसे पता होना चाहिए। जिसको सब-कुछ पता होगा, उसको नौकरी ढूंढ़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वह नौकरी देने वाला बनेगा। शिक्षक की भूमिका इसी में अहम है। वही उसको गढ़ता है, भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करता है। कबीर का उदाहरण देते हुए ब्रजेश पाठक ने कहा कि उनके गुरु रामदास ने गंगा के तट की सीढ़ियों पर कबीर के कान में कुछ कहा, जिनसे बगैर अक्षर ज्ञान की उनकी रचनाएं कालजयी हो गईं। इनको पढ़कर लगता है कि यह आज के लिए ही लिखी गईं हैं।
मां-बाप ईश्वर तुल्य, बच्चे में डालें संस्कार
ब्रजेश पाठक ने कहा, माता-पिता धरती पर जीवित ईश्वर हैं। शिक्षक को अपने बच्चों में इस तरह का संस्कार डालना है कि वह अपने मां-बाप की ईश्वर की तरह कद्र करें। आंख खोलने के बाद बच्चे की पहली शिक्षक मां है। उसकी गोद में ही संस्कार पलते हैं। वहीं, दूसरा गुरु पिता है। मां अगर खुद को भीगे बिस्तर में रखकर बच्चे को अच्छी नींद सुलाती है, तो पिता भूखे रहकर, अपने जज्बात को कैद कर बच्चे को बेहतर शिक्षा दिलाने लखनऊ व दिल्ली भेजता है।
अपने अनुभवों का जिक्र करते हुए ब्रजेश पाठक ने कहा कि अफसोसजनक यह है कि बड़े होने पर बच्चे मां-बाप से दूरी बना लेते हैं। दिल्ली-मुंबई में करिअर बना रहे बच्चों के पास जब मां-बाप पहुंचते हैं, तो उनको एक छोटे से कमरे में रख दिया जाता है। दोस्तों से मुलाकात नहीं करवाई जाती। जबकि हमारा संस्कार यह नहीं है। हमें समझना होगा कि मां-बाप हमारे गौरव हैं। एक शिक्षक को इस तरह की सीख अपने बच्चों को देनी है।
गाइडेड मिसाइल आज की, शब्दभेदी बाण सहस्राब्दियों पुराने
ब्रजेश पाठक ने कहा कि हमारा इतिहास बहुत समृद्ध रहा है। गाइडेड मिसाइल मौजूदा दौर का विकास है, जबकि शब्दभेदी बाण सहस्राब्दियों पहले हमारे यहां थे। पाठक के मुताबिक, विदेशी आक्रांताओं ने जब वेद-पुराण जलाने शुरू किए तो तत्कालीन ऋषियों ने अपने शिष्यों से गुरु दक्षिणा के तौर पर मांग की थी कि वह अपने ग्रंथों को कंठस्थ करें और पांच-पांच लोगों तक इसे पहुंचाएंगे। यह काम तत्कालीन छात्रों ने ठीक से किया। तभी हमारी संस्कृति और विचारधारा सहस्राब्दियों से बनी हुई है।
आक्रांताओं के हमलों के बाद भी नहीं टूटे हमारे संस्कार
ब्रिटिश शासन का जिक्र करते हुए ब्रजेश पाठक ने कहा कि ब्रिटिश शिक्षाविद लार्ड मैकाले ने कहा था कि जब तक वह भारतीयों की शिक्षा व्यवस्था पर कब्जा नहीं कर लेते, भारतीयों को कब्जे में लाना मुमकिन नहीं होगा। इसके बाद भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बहुत से बदलाव किए गए। इसको लागू करने के अनवरत प्रयास भी हुए, लेकिन उनको पूरी कामयाबी नहीं मिली। आज भी हम बिना स्नान किए भोजन नहीं करते, बड़े-बुजुर्गों का पैर छूते हैं, जो घर आता है, उसे खाना खिलाते हैं। किसी संस्थान की ट्रेनिंग से नहीं, यह सब हमारी संस्कृति से, संस्कारों से हममें आता है।
मोदी सरकार ने किए शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव
ब्रजेश पाठक ने भरोसा दिलाया कि सरकार शिक्षकों के साथ हर कदम पर खड़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने नई शिक्षा नीति से देश की शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव किए हैं। इसमें मातृभाषा में शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है। छात्रों की प्रतिभा को हर स्तर पर निखारा जा रहा है। इसमें छात्र का हर तरह से विकास होगा।