-टारगेट थेरेपी से 65 फीसदी बच्चों में लौट रही आंखों की रोशनी
-पिछले दस सालों में 170 बच्चों का हो चुका है सफल इलाज
-प्रक्रियाम में सीधे आंखों के ट्यूमर तक पहुंचाई जाती है दवा
-मरीज पर नहीं होता दवा का कोई भी दुष्प्रभाव
-जीवन में आगे भी नहीं आती है कोई समस्या
-इलाज के बाद बच्चा जीता है सामान्य जीवन
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। आंख के कैंसर को मात देकर सामान्य जिंदगी जी रहे बच्चों को एम्स ब्रांड एंबेसडर बनाएगा। इनमें से कई बच्चों ने इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेज में दाखिले की परीक्षा पास की। अब यह आंख के कैंसर रेटिनोब्लास्टोमा की टारगेट थेरेपी को प्रोत्साहित करते हुए दिखेंगे। ब्रांड एंबेसडर बनकर इनकी कोशिश मरीजों के साथ मेडिकल संस्थानों को भी राह दिखाने की होगी। एम्स प्रशासन का कहना है कि जल्द ही इनको ब्रांड एंबेसडर बनाकर एम्स से जोड़ा जाएगा।
दरअसल, एम्स दिल्ली में ही टारगेट थेरेपी से रेटिनोब्लास्टोमा के उपचार की सुविधा है। हर साल देश में दो हजार से अधिक बच्चों में यह रोग हो रहा है। अकेला सरकारी संस्थान होने से एम्स में मरीजों का दबाव ज्यादा है। जबकि समय पर इलाज न मिलने से आंखों की रोशनी जाने से लेकर मरीज की मौत तक हो जाती है। ऐसे में एम्स प्रशासन इस थेरेपी को दूसरे एम्स व सहित देश के अन्य संस्थानों में प्रमोट करने की योजना बनाई है। इसमें मरीजों को भी इस बारे में जागरूक करना है। एम्स विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रांड एंबेसडर दोनों के लिए कारगर साबित होंगे। इसके लिए एम्स ने पिछले दस सालों में इलाज करवाकर सामान्य जिंदगी जी रहे मरीजों की पहचान करना शुरू किया है। इनको जल्द ही एम्स से जोड़ कर योजना को धरातल पर उतारा जाएगा।
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65 फीसदी बच्चों की लौटी रोशनी
टारगेट थेरेपी से एम्स में आंख के कैंसर के इलाज करवाने वाले 65 फीसदी बच्चों के आंखों की रोशनी लौटी है। उपचार के बाद आगे फिर से ऐसी कोई समस्या होने का खतरा भी काफी कम है। पिछले दस साल में एम्स इस विधि से 170 बच्चों का सफल इलाज कर चुका है। इसमें जांघिक धमनी के रास्ते एक कैथेटर को नेत्र धमनी से होते हुए आंख हिस्से तक पहुंचाया जाता है, जहां ट्यूमर है। इसके बाद माइक्रो कैथेटर की मदद से प्रभावित हिस्से पर दवा डाली जाती। इससे ट्यूमर छोटे-छोटे हिस्सों में टूटकर खत्म हो जाता है। एक डोज दवा देने की इस प्रक्रिया में करीब दो से तीन घंटे का समय लगता है। इस थेरेपी में कई बार बच्चे पर एक डोज में असर हो जाता है और कई बार तीन से चार डोज की जरूरत पड़ जाती है।
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ट्यूमर पर होता सीधा वार
एम्स के तंत्रिका विकिरण एवं उपचार विभाग के प्रमुख व प्राेफेसर डॉ. शौलेश गायकवाड़ ने बताया कि इस टारगेट थेरेपी की मदद से सीधे ट्यूमर पर वार किया जाता है। इसमें दवा की डोज भी कम लगती है जिस कारण शरीर के अन्य हिस्सों पर दुष्प्रभाव भी नहीं होता। जबकि सामान्य कीमोथेरेपी से शरीर के अन्य हिस्सों में असर होता है। इससे 65 फीसदी बच्चों की आंखों की रोशनी को बचाया गया है। अब हर सप्ताह तीन से चार बच्चों का इससे इलाज किया जा रहा है।
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दे रहे हैं ट्रेनिंग
इस तरह के इलाज में नेत्र विज्ञान विभाग, न्यूरो ऑन्कोलॉजी, इंटरवेंशनल न्यूरोरेडियोलॉजी, बाल रोग विभाग, न्यूरोनेथिसिया विभाग की मदद ली जाती है। एम्स दिल्ली की देखरेख में सुविधा के विस्तार जोधपुर और गुवाहाटी एम्स में भी किया जा रहा है। इसके लिए ट्रेनिंग तक दी जा रही है।
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हर साल आ रहे दो हजार मरीज
देश में हर साल रेटिनोब्लास्टोमा के दो हजार मामले सामने आ रहे हैं। यह सामान्य रूप से पांच साल तक के बच्चों में पाया जाता है। इस समस्या के होने के पीछे अनुवांशिकी एक बड़ा कारण है। एम्स के डॉ. आरपी सेंटर में नेत्र विज्ञान विभाग की प्रोफेसर डॉ. भावना चावला ने बताया कि एम्स में पिछले 20 सालों में ऐसे करीब चार हजार मरीजों का उपचार किया गया है। हर साल औसत 250 से 300 मरीज आते हैं। सबसे ज्यादा मरीज उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, बिहार से आते हैं।
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बच्चों में यह दिखते हैं लक्षण
-अनुवांशिकी
- आंखों की पुतली में सफेद धब्बा
- आंखों में तिरछापन
- आंखों में लाली
- आंखों में सूजन
- आंखों का बाहर निकलना