10 अप्रैल को होने वाले मतदान को लेकर प्रचार अभियान दिलचस्प होता जा रहा है। चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशी क्षेत्र के विकास की बात छोड़कर वोटरों को लुभाने के लिए जाति-बिरादरी की दुहाई देने लगे हैं।
अधिकांश नेता जातीय समीकरण की गोटी बिछाने की कोशिश में जुटे हैं। गांवों की चौपालों से लेकर शटल गाड़ियों तक में इन दिनों चुनावी परिचर्चा जोर-शोर से चल रही है।
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कांग्रेस ने जाट के बाद गुर्जर वोटरों की अधिकता को देखते हुए एक बार फिर गुर्जर नेता अवतार सिंह भड़ाना पर दांव लगाया है। उन्हें टक्कर देने के लिए भाजपा ने भी मोदी लहर के नाम पर कृष्णपाल गुर्जर पर दांव लगाया है।
ब्राह्मण और एससी वोट बैंक देखकर बसपा ने राजेंद्र शर्मा को मैदान में उतारा है। प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल इनेलो ने पंजाबी कार्ड खेलते हुए दिल्ली निवासी आरके आनंद को मैदान मारने भेजा है।
नई नवेली आम आदमी पार्टी ने भी जातीय समीकरण को देखते हुए जाट उम्मीदावार पुरुषोत्तम डागर को खड़ा किया है।
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कांग्रेस के अवतार भड़ाना कह रहे हैं कि वह गुर्जरों के असली मसीहा हैं, जबकि इनेलो के आरके आनंद पंजाबी बिरादरी के नाम पर वोट मांग रहे हैं।
भाजपा से नाराज मनधीर सिंह मान ने बिरादरी की अनदेखी का आरोप लगाते हुए निर्दलीय ताल ठोंकी है।
बसपा प्रत्याशी राजेंद्र शर्मा ब्राह्मणों को अपने तरीके से मना रहे हैं। कुल मिलाकर चुनाव जाति केंद्रित होता जा रहा है। ऐसे में डर है कि विकास का मुद्दा पीछे न छूट जाए।