ऐसी दुखद घटना केवल इस व्यक्ति के साथ ही नहीं होती, बल्कि समय पर अस्पताल न पहुंच पाने सिर, छाती और पेट में लगी अतिगंभीर चोट वाले 80 फीसदी मरीजों के साथ होती है। दरअसल, नजदीक में समर्पित ट्रामा सेंटर व ट्रामा सर्जन न होने के कारण दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल मरीज को समय पर उपचार नहीं मिल पाता, जिस कारण अधिकतर मामलें में मरीज दम तोड़ देते हैं। एम्स ट्रामा सेंटर के सर्जन डॉ. दिनेश गोरा की माने तो एम्स ट्रामा में रोजाना 100 से 150 केस आते हैं। इसमें से करीब 20 फीसदी मरीज गंभीर होते हैं, जिन्हें रेड जोन में रखा जाता है।
उन्होंने कहा कि रेड जोन में आने वाले ज्यादातर मरीज गोल्डन ऑवर में ट्रामा सेंटर तक नहीं पहुंच पाते जिस कारण उनकी मौत हो जाती है। उन्होंने कहा कि देश में ट्रामा सेंटर और ट्रामा सर्जन की भारी कमी है, जिस कारण मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता। उन्होंने कहा कि लोगों के जान बचाने के लिए ट्रामा ट्रीटमेंट की जानकारी सभी स्वास्थ्यकर्मियों को दी जानी चाहिए, जिससे वह गंभीर मरीजों को उपचार दे सकेंगें।
कटे अंग को ला सकते हैं थैली में
डॉ. गोरा ने कहा कि दुर्घटना में यदि कोई अंग कट जाता है या फिर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाता है तो उसे थैली में रखकर लाया जा सकता है। यदि 4-5 घंटे में उसे ट्रामा पहुंचा दिया जाता है तो उसे फिर से जोड़ सकते हैं। हालांकि अंग को लाने के दौरान ध्यान रखना चाहिए कि अंग को थैली या कपड़े में लपेट कर लाया जाए। यदि बर्फ मिल जाए तो अंग की थैली के बाहर लगा दिया जाना चाहिए। गीला कपड़ा भी लगाया जा सकता है, जिससे अंग को सुरक्षित लाया जा सकता है।
हर साल हो जाती है लाखों की मौत
एनसीआरबी के अनुसार देश में हर साल दुर्घटना के कारण लाखों लोगों की मौत हो जाती है, जबकि एक करोड़ से अधिक लोगों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। डाटा के अनुसार, साल 2021 में दुर्घटना के कारण 397530 लोगों की मौत हो गई।