तरीका भी बेहद आसान
उत्तर प्रदेश से होता हुआ, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार समेत देश के सात राज्यों तक पहुंच चुका है। करीब तीन सौ से ज्यादा गांवों में आज पुस्तकालय चल रहे हैं। तरीका बेहद सामान्य है। पहले, सोशल मीडिया का इन लोगों ने सहारा लिया। लोगों से अपील की कि वह इस काम में जुड़ें। जहां लोग जुड़ते उनको पहले गनौली गांव की टीम पुस्तकालय खोलने का तरीका सिखाती है। पुस्तकालय खुल जाने के बाद यह इनसे अभियान के विस्तार करने की अपील करती है। आगे इसका जिम्मा यही लोग उठाते हैं। इस तरह से एक चेन बनती जा रही है।
न कोई कोष, न औपचारिक ढांचा
इस अभियान से जुड़े किसी भी शख्स ने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी है। इस अभियान का कोई संयुक्त कोष भी नहीं है। पुस्तकालय खोलने में जो भी खर्च आता है, उसका इंतजाम ग्रामीण स्तर पर ही होता है। वहीं, टीम से जुड़े अपने परिवहन समेत दूसरे खर्चों का वहन खुद ही करते हैं। मजेदार बात यह कि यूपी के बागपत के घिटोरा गांव का पुस्तकालय 40 लाख रुपये में सामुदायिक सहयोग से ही तैयार हुआ है। इस मुहिम में कई जिलों के जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान भी इस मुहिम से जुड़ गए हैं।
मंदिर, मस्जिद में भी खुल गए हैं पुस्तकालय
ग्राम पाठशाला के सदस्य अजय पाल नागर बताते हैं कि अब तक बने तीन सौ से ज्यादा पुस्तकालयों में 290 पुस्तकालय गांव के पंचायत घर में बने हैं। जिन गांवों में लोग पैसा देने में असमर्थ थे, उन गांवों में मंदिर और मस्जिद परिसर में पुस्तकालय खोले गए हैं। अजय पाल ने बताया कि टीम पाठशाला की टीम के सभी सदस्य नौकरीपेशा हैं। इसमें 80 फीसदी लोग पुलिस सेवा से जुड़े हैं। टीम के सदस्य शनिवार और रविवार को किसी भी गांव में जाते हैं और वहां के गांव वालों को इकट्ठा करते हैं। फिर वह गांव के प्रधान से अपने गांव के बच्चों के लिए एक पुस्तकालय खोलने का आग्रह करते हैं, जिसे गांव वाले मना नहीं कर पाते हैं। उनके आने के बाद गांव के लोग मुहिम में जुट जाते हैं और गांव में पैसा इकट्ठा कर पुस्तकालय का निर्माण कर लेते हैं। फिर, गांव वाले पुस्तकालय के उद्घाटन के दिन ग्राम पाठशाला के लोगों को बुलाते हैं। सदस्यों की उपस्थिति में बच्चे या फिर गांव के गणमान्य लोगों से इसका उद्घाटन करवाया जाता है।
अजयपाल नागर ने बताया कि पुस्तकालय खोले जाने की बात की जानकारी जब पास के गांव को होती है तो फिर वह अपने गांव में पुस्तकालय खोलने के लिए ग्राम पाठशाला के सदस्यों से संपर्क करते हैं। इस तरह से गांव गांव में पुस्तकालय का निर्माण होने लगा है। इन पुस्तकालय में दान में किताबें दी जाती है और फिर गांव के लोग शादियों के दौरान मंदिर की तरह पुस्तकालय को दान देते हैं, जिससे बच्चों के लिए समाचार पत्र और मैगजीन की व्यवस्था की जाती है।