तीसरी बार सरकार बनने के बाद से ही लगातार विपक्षी पार्टी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी को घेर रही थी। अलग-अलग जांचों में भी पार्टी फंसी हुई थी। मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री ही नहीं आम आदमी पार्टी के मंत्री भी जेल के सलाखों के पीछे रहे। अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया को जमानत तो मिली लेकिन वह भी शर्तों पर। इस तरह से भ्रष्टाचार आम आदमी पार्टी के लिए जी का जंजाल बना हुआ था। उधर, सुप्रीम कोर्ट की बंदिशों से बतौर मुख्यमंत्री काम करना सियासी तौर पर उनके लिए फायदेमंद नहीं था। राजनीति के जानकारों की माने तो इस सियासी पासा के बाद आम आदमी पार्टी की छवि बेहतर होगी। विधानसभा चुनाव में बहुमत में आती है तो बेदाग छवि के साथ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का भी कद उभरेगा। उनकी राष्ट्रीय नेता की छवि मजबूत होगी।
दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाने के अंदेशे को मिला विराम
अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे देने के निर्णय से दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाने के अंदेशे को भी विराम दे दिया है। इससे विपक्ष की जो रणनीति थी वह धड़ाम हो गई है। दरअसल छह महीने में विधान सभा सत्र बुलाने की मजबूरी सरकार की थी। अदालत के शर्तों के अनुसार कैबिनेट की बैठक और विधानसभा सत्र बुलाने में कई बाधाएं थी। जिससे संवैधानिक संकट का खतरा था, जिसे विधानसभा नेता प्रतिपक्ष बार-बार मुद्दा बना रहा था। यहां तक कि राष्ट्रपति ने भी इस आरोप का संज्ञान लेते हुए इस मामले को केंद्रीय गृह मंत्रालय और सचिव के पास भेज दिया था। लेकिन इस्तीफे की पेशकश से विपक्ष के इस दांव को भी धराशायी कर दिया है।
जेल से इस्तीफा नहीं देने की वजह
राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो अरविंद केजरीवाल ने जेल में रहते हुए इसलिए इस्तीफा नहीं दिया क्योंकि उनकी पार्टी में पकड़ मजबूत नहीं रह पाती। पार्टी के बिखरने का भी इससे खतरा महसूस हो रहा था खतरा। जमानत पर लौटने और जेल से बाहर होने से केजरीवाल की पार्टी व नेताओं पर पैनी नजर होगी। दलबदल करने वालों को भी अहसास होगा कि आम आदमी पार्टी दिल्ली में मजबूत स्थिति में है और कथित घोटालों से बिगड़ी छवि को इस्तीफा देने से सुधर जाएगी। मुख्यमंत्री सहानुभूति बटोरने में कामयाब हो जाएंगे। इस्तीफा देना छवि चमकाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी में उभर रहे विरोध के सुर भी शांत पड़ जाएगा।