वहीं हरिद्वार में चिन्मय डिग्री कॉलेज चौक के पास एक महिला कांस्टेबल की स्कूटी पेड़ से टकरा गई। खून से लथपथ महिला कांस्टेबल सड़क पर तड़पती रही, लेकिन तमाशबीन बने राहगीर मोबाइल से वीडियो बनाते रहे। इसी दौरान भीड़ देख ठहरीं एक बुजुर्ग महिला उन्हें रिक्शे में लादकर मेट्रो अस्पताल ले गईं, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। यदि महिला कांस्टेबल को तुरंत उपचार मिल गया होता तो शायद उनकी जान बच सकती थी।
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ऐसी ही एक और घटना जून 2019 की है जिसे देख कर रोंगटे खड़े हो जाएंगे। दिल्ली के ज्योति नगर में आपसी रंजिश के कारण छह लोगों ने एक व्यक्ति पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दी थी। घायल हो कर सड़क पर गिर जाने के बाद उसके परिजन लोगों से मदद की गुहार लगाते रहे। वो घायल बेटे के सामने सिर पटक-पटक कर रोते रहे, लोगों ने वीडियो बनाया लेकिन कोई मदद के लिए आगे नहीं आया। 37 सेकंड की इस वायरल वीडियो को देख कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
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यह घटनाएं मानवीय संवेदनाओं की और उससे भी ज्यादा मानवता की त्रासदी है कि किसी को असहाय अधमरा देख कर जल्द से जल्द कैमरा ऑन करने के लिए इतने सारे हाथ उठ जाते हैं, लेकिन उनमें से एक भी आगे आ कर डायल पैड खोल कर एंबुलेंस या पुलिस को फोन करने की जरूरत नहीं समझता है।
हमारे नैतिक मूल्यों पर भौतिक सुविधाओं का इतना विपरीत असर पड़ेगा, यह इन सुख-सुविधाओं के निर्माताओं ने भी नहीं सोचा होगा। अमर उजाला अपने पाठकों से अपील करता है कि तकनीक और सोशल मीडिया की इस वर्चुअल रेस में आगे निकलने के लिए मानवता और नैतिकता को न भूलें। किसी भी हादसे में घायल व्यक्ति को देखें तो सोशल मीडिया पर शेयर करने के लिए वीडियो बनाने के बजाय आप उनकी सहायता के लिए आगे आएं।
किसी को सार्वजनिक जगहों पर घायल देख कर तुरंत एंबुलेंस या पुलिस को कॉल कर के सूचित करें। आपके एक सही कदम से किसी की जान बच सकती है साथ ही कई लोगों को सीख भी मिल सकती है।