वर्ष 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट के गुनहगार याकूब मेनन की फांसी दिल्ली से सैकड़ों किलोमीटर दूर नागपुर में दी गयी लेकिन उसका असर लाहौर बस सेवा पर पड़ा है।
खतरे की आशंका को देखते हुए लाहौर से दिल्ली आने वाली भारतीय बस सदा-ए-सरहद में महज चार यात्री ही दिल्ली पहुंचे हैं। खास बात यह है कि सोलह सालों में यह पहला मौका है, जब सबसे कम यात्रियों ने इंटरनेशनल बस सेवा में सफर किया है।
इसी के चलते करीब साढ़े चार घंटे पहले ही बस ने अपना सफर पूरा कर लिया है। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की तल्खी और दोस्ती यूं तो जगजाहिर है, जिसके चलते पिछले सात महीनों से इंटरनेशनल दिल्ली-लाहौर बस सेवा महज वाघा बार्डर तक ही सेवाएं दे रही है।
फांसी पर गहमागहमी के बीच लोगों ने रद्द कराई बुकिंग
जबकि दोनों देशों की सरकारों के समझौते के तहत दिल्ली-लाहौर बस सेवा दिल्ली से लाहौर के बीच अप एंड डाउन चलनी तय हुई थी।
सूत्रों के मुताबिक, बृहस्पतिवार सुबह वाघा बॉर्डर से दस बजे दिल्ली ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन की सदा-ए-सरहद बस दिल्ली के लिए रवाना हुई थी। बस की बुकिंग फुल थी लेकिन फांसी पर उठे बबाल के चलते यात्रियों ने ऐन वक्त बुकिंग रद करवा दी।
लाहौर से बस में महज चार यात्री ही दिल्ली पहुंचे हैं। जबकि अंबेडकर टर्मिनल दिल्ली से सुबह छह बजे निकली पाकिस्तान की दोस्ती बस में भी महज 19 यात्री ही राजधानी से रवाना हुए हैं।
सरहद पार न कोई गया न आया
बता दें कि 19 फरवरी 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत-पाकिस्तान दोस्ती की गवाह लाहौर बस सेवा को हरी झंडी देकर रवाना किया था।
हालांकि 13 दिसंबर 2001 को संसद हमले के बाद बस सेवा रोक दी गयी थी। उसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में मधुरता लाने के लिए 16 जुलाई 2003 को लाहौर बस सेवा दोबारा बहाल कर दी गयी थी।
भारत-पाक दोस्ती की मिसाल इस बस सेवा के तहत दिल्ली से पाकिस्तान की बस लाहौर रवाना हुई। जबकि लाहौर से भारतीय बस हिंदोस्तान की सरजमीं पर पहुंची है।
हालांकि भारतीय बस सदा-ए-सरहद में एक भी पाकिस्तानी नहीं आया। जबकि पाकिस्तानी बस दोस्ती में एक भी भारतीय ने सफर नहीं किया।