इस तरह हुई थी हिंसा
पांच जनवरी 2020 की शाम भी सामान्य दिनों की तरह की शाम थी। छात्र अपने-अपने कैंटीन में भोजन करने के बाद अपने-अपने कमरों में चले गए थे। कुछ छात्र लाइब्रेरी में पढ़ाई कर रहे थे तो कुछ आराम करने की तैयारी कर रहे थे। इसी बीच अचानक 50-60 लोगों की भीड़ अपने हाथों में डंडा, रॉड लिए हुए पेरियार हॉस्टल की लाइब्रेरी में दाखिल हुई थी। मुंह पर मास्क लगाए एक लड़की उनको बता रही थी कि उन्हें क्या करना है। लाइब्रेरी में घुसते ही उसने कहा था, किसी को मत छोड़ो। एक दिव्यांग की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा था कि दिव्यांग है तो क्या हुआ, फिर भी मारो। इसके बाद हमलावरों ने एक-एक छात्र को पीटा था। हमले में लाइब्रेरी और हॉस्टल की खिड़कियां टूट गई थीं। लगभग तीन दर्जन से ज्यादा छात्रों को सिर, हाथ, पैर और पूरे शरीर पर चोटें आई थीं।
साक्ष्य मिटाने की कोशिश
वीडियो फुटेज में यह बात साफ तौर पर सामने आई थी कि सर्वर रूम में घुसकर रिकॉर्डिंग और अन्य सबूत नष्ट करने की कोशिश की गई थी। सिक्योरिटी में लगे जवानों ने बताया था कि मुख्य गेट पर सीसीटीवी लगे होने के कारण हमलावर मुख्य गेट से नहीं आए होंगे। एक हजार एकड़ में फैले जेएनयू परिसर की टूटी दीवारें फांदकर हमलावर घुसे और छात्रों पर हमला कर वापस चले गए। इस हमले के बाद जेएनयू परिसर की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे थे, लेकिन कैंपस की सुरक्षा बढ़ाने पर अब तक कोई काम नहीं हुआ है। छात्रों को आशंका है कि फिर कभी भी उसी तरह की हिंसा दुबारा भी घट सकती है।
मामले में एबीवीपी और लेफ्ट छात्र संगठनों ने अपनी-अपनी शिकायत दर्ज कराई थी
हमले में बुरी तरह घायल होने वाली वामपंथी छात्र नेता आइसी घोष ने बताया था कि इस मामले में एबीवीपी के कुछ कार्यकर्ताओं के नाम से शिकायत दी गई थी। उनके फुटेज साफ दिखे थे, छात्रों ने उन्हें पहचान लिया था, लेकिन इसके बाद भी अब तक उन छात्रों से कोई पूछताछ नहीं की गई। इस मामले में एबीवीपी और लेफ्ट छात्र संगठनों ने अपनी-अपनी शिकायत दर्ज कराई थी। इन शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए कुल तीन एफआईआर दर्ज की गई थीं। दो एफआईआर पुलिस ने दर्ज की थीं और एक एफआईआर जेएनयू प्रशासन की तरफ से दर्ज कराई गई थीं। मामले को गरमाता देख इसकी जांच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया गया था। लेकिन आरोप है कि वीडियो फुटेज में हमलावर लड़की की पहचान होने के बाद भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
इस मामले में अब तक कुछ नहीं हुआ
पुलिस ने कुछ वाट्सएप ग्रुप की चैट को संज्ञान में लिया था। कथित तौर पर इसमें हमले की योजना बनाई गई थी। सर्वर रूम, साबरमती हॉस्टल, पेरियार हॉस्टल और नर्मदा हॉस्टल तक से सबूत जुटाने की बात कही गई थी। लेकिन थोड़ी पूछताछ के बाद इस मामले में अब क्या हो रहा है, कोई नहीं जानता। पुलिस ने कुछ दिनों तक जांच करने, सबूत जुटाने की दिखावटी कोशिश की, लेकिन समय के साथ सबकुछ बीत गया और ढाई साल का समय बीत जाने के बाद भी इस मामले में अब तक कुछ नहीं हुआ। 2016 के एक मामले में पुलिस ने लगभग तीन साल बाद यानी 2019 में चार्जशीट फाइल की है। लिहाजा इस मामले में भी तीन-चार साल बाद चार्जशीट फाइल की जाए तो किसी को कोई आश्चर्च नहीं होगा।
देरी क्यों
संतोष कहते हैं कि यह बात सबके सामने खुल गई है कि सरकार जेएनयू में हिंसा को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करती है। यहां पर हमले कर वह किसी मामले को एक झटके में राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना देती है। उन्हें लगता है कि रामनवमी पर देश के सात-आठ राज्यों में हुई हिंसा से मामला उतने लोगों तक नहीं पहुंचा जितना केवल जेएनयू की हिंसा के कारण पहुंच गया। इसी कारण यहां जबरदस्ती मामलों को उठाया जाता है, लेकिन उनका उद्देश्य अपने मतदाताओं तक कोई संदेश देना होता है जिसके लिए जेएनयू के मंच का उपयोग किया जाता है।