फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

निगम के कामकाज में पार्षद पतियों की दखल पर क्यों नहीं लग रही रोक

विज्ञापन
विज्ञापन
गुुरुग्राम। नगर निगम के अधिकारियों द्वारा पार्षद पतियों व उनके परिजनों पर लगाए गए दुर्व्यवहार के आरोपों पर कुछ निगम पार्षदों ने परोक्ष रूप से सहमति जताई है। तो वहीं, निगम पार्षदों ने इस मामले पर दो टूक राय देते हुए विभागीय बैठकों के साथ ही कामकाज में पार्षद पतियों व परिजनों के दखल को गलत बताते हुए इस पर भी रोक लगाने की मांग की है।
विज्ञापन

उन्होंने बैठकों में पार्षद पतियों व परिजनों के प्रवेश प्रतिबंध को लेकर निगमायुक्त के आदेश को सही ठहराया है लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर आशंका भी जताई है। पार्षदों का कहना है कि एक तरफ तो हम महिला आरक्षण की बात करते हैं और दूसरी तरफ जनता द्वारा निर्वाचित किए जाने के बाद महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित कर खुद विभागीय कामकाज में दखल देने लग जाते हैं। यह परंपरा जितनी जल्दी हो सके, बंद होनी चाहिए। मालूम हो कि निगमायुक्त मुकेश कुमार आहूजा ने अधिकारियों के साथ बैठक के बाद निगम के सदन व अन्य बैठकों में पार्षद पतियों व परिजनों के शामिल होने पर प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं, अधीक्षण अभियंता (एसई) रमेश शर्मा के निलंबन के बाद से ही नगर निगम के अधिकारी (विशेष तौर पर इंजीनियरिंग विंग) विभागीय कामकाज में पार्षद पतियों व परिजनों के दखल को लेकर मुखर बने हुए हैं।
निगमायुक्त के सामने रखी थी बात
अधिकारियों ने निगमायुक्त आहूजा के समक्ष भी अपनी बात रखते हुए पार्षद पतियों व परिजनों पर कामकाज में दखल देने व दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था। अधिकारियों का कहना है कि उनके साथ पुरुष पार्षद, पार्षद पति व उनके परिजन बदसलूकी करते हैं और यहां तक कि गाली-गलौच पर आमादा हो जाते हैं। ऐेसे में वह अब और ज्यादा बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं। निगम पार्षदों का कहना है कि यदि विभागीय कामकाज में पार्षद पतियों व परिजनों का दखल बंद हो जाए तो काफी हद तक समस्या का समाधान हो जाए, जिसे देखते हुए निगमायुक्त ने अब इस बारे में आदेश जारी कर दिया है।
विज्ञापन

13 महिलाएं पार्षद हैं
नगर निगम के कुल 35 वार्डों में से 13 महिला पार्षद अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। इसमें से करीब 7-8 पार्षद ऐसी हैं, जिनके पति ही क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं। ऐसे में यह सवाल और अहम हो जाता है कि क्या निगमायुक्त के आदेशों का क्रियान्वयन हो पाएगा। हालांकि, पार्षद पतियों से इस बारे में उनकी राय जानने की कोशिश की गई लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला।
पार्षदों का बयान :
एक तरफ तो हम महिलाओं के आरक्षण की बात करते हैं और जब जनता एक महिला को पार्षद चुनती है तो उनको घर के रसोई तक सीमित कर दिया जाता है। निगम के सदन की बैठक में अधिकांश पार्षदों के पति हिस्सा लेते हैं। यह परंपरा बंद होनी चाहिए ताकि महिलाओं को उनका उचित स्थान मिल सके।
- वीरेंद्र राज यादव, पार्षद वार्ड-4
मेरा मानना है कि जनता ने जिसे अपना प्रतिनिधि चुना है उसे ही बैठकों व अन्य कामकाज में हिस्सा लेना चाहिए। यह भी सही है कि एक महिला किसी अधिकारी के साथ कभी बदसलूकी नहीं कर सकती तो हमें महिलाओं को आगे बढ़ाकर उनको निगम के कामकाज में सक्रिय रूप से भागीदारी का मौका देना चाहिए।
- अश्वनी शर्मा, पार्षद वार्ड-19
पार्षद पतियों के द्वारा आए दिन अभद्र व्यवहार किया जाता है। हम बहुत बर्दाश्त कर चुके हैं। जिस तरीके से हमारे साथ दुर्व्यवहार होता है, इसे हम और सहन नहीं करेंगे। अगर उनको जनता ने चुना है तो हम भी जनता की सेवा के लिए ही बैठे हैं लेकिन दुर्व्यवहार सहन नहीं करेंगे।
विज्ञापन

- टीएल शर्मा, मुख्य अभियंता नगर निगम गुरुग्राम
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें