गुरुग्राम। मुंबई, कोल्हापुर, अग्रोहा, वेल्लोर की श्रेणी में गुरुग्राम शहर को भी महालक्ष्मी का प्रत्यक्ष आशीर्वाद मिलेगा। गुरुग्राम में पिछले करीब सात वर्षों से बन रहा महालक्ष्मी मंदिर 16 अप्रैल को भक्तों के लिए खोल दिया जाएगा। इस दिन महालक्ष्मी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। देश में नारायण लक्ष्मी के मंदिर तो कई हैं मगर महालक्ष्मी के मंदिर गिने चुने हैं।
गुरुग्राम के मंदिर का स्थापत्य अनोखा है। मंदिर निर्माण में लोहे का प्रयोग नहीं किया गया है। यह केवल पत्थरों से बना है। पत्थरों पर दक्षिण भारतीय और ओडिशा की शैली में शिल्पकारी की गई है। इन दिनों इस मंदिर को पूरा करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में चल रही है। मंदिर को रात में रंगीन बत्तियों से सजाया जाता है। दिल्ली एनसीआर में अभी तक ऐसा महालक्ष्मी का मंदिर नहीं है, इस कारण मंदिर को लेकर लोगों में काफी उत्सुकता रही है, लोग इसके पूरा होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
हालांकि गुरुग्राम के सेक्टर-पांच में एक और महालक्ष्मी मंदिर बनाया जा रहा है मगर सिद्धेश्वर मंदिर के परिसर का मंदिर यहां का पहला महालक्ष्मी मंदिर होगा। मंदिर में स्थापित किए जाने के लिए मां महालक्ष्मी की अष्टधातु की मूर्ति पिछले दिनों गुरुग्राम में ही तैयार की गई। लोगों ने धातु दान किए और उनके समक्ष ही उसे पिघला कर एक टन वजन की पांच फुट की प्रतिमा तैयार की गई है। वाराणसी से आए कारीगरों ने इसे तैयार किया है।
सिद्धेश्वर मंदिर कमेटी के प्रधान राम अवतार गर्ग बिट्टू ने बताया कि 15 अप्रैल को मां महालक्ष्मी की झांकी के साथ शोभा यात्रा निकलेगी। शोभा यात्रा भव्य तरीके से निकाली जाएगी। 16 अप्रैल को मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होगी। इसके लिए दक्षिण भारत से 11 पंडितों को खास तौर पर बुलाया गया है।
वास्तु शिल्प और स्थापत्य की दृष्टि से अनोखा
गुरुग्राम में वर्ष 2014 में सोहना चौक स्थित सिद्धेश्वर मंदिर के परिसर में महालक्ष्मी मंदिर बनना शुरू हुआ था। मंदिर के आर्किटेक्ट मनोज सोमपुरा त्रिवेदी अहमदाबाद के हैं। उन्होंने वृंदावन स्थित प्रेम मंदिर, अक्षरधाम मंदिर मंदिर समेत कई मंदिरों के निर्माण में हिस्सा लिया है। सोमपुरा परिवार के लोग देश भर में मंदिर बनवाते रहे हैं। मनोज त्रिवेदी ने बताया कि यह मंदिर नागर शैली में बनाया गया है। इसमें वास्तु और स्थापत्य का विशेष ध्यान रखा गया है। बाहर की ओर गुलाबी मार्बल हैं। यह इस तरह बनाया गया है कि हजारों साल तक इसका कोई नुकसान नहीं हो। इसके निर्माण में लोहे की एक कील का भी प्रयोग नहीं किया गया है। ओडिशा और दक्षिण भारत के शिल्पकारों ने इसकी दीवारों पर चित्र उकेरे हैं। इस मंदिर के गुंबज से लेकर दीवारों तक को दर्शनीय और अनोखा बनाया गया है। करीब 61 फुट की इसकी ऊंचाई है और 81 फुट जमीन के नीचे नींव में पत्थर लगाए गए हैं। इस तरह यह दीर्घ काल के लिए सुरक्षित रहेगा। कोशिश की गई है कि मंदिर पूरे देश और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों को धार्मिक पर्यटन का केंद्र बने।