यही कारण रहा कि सोमवार को दोपहर बाद करीब एक दर्जन लोग लिफ्ट में फंस गए और वो करीब 20 मिनट तक लिफ्ट में जिंदगी और मौत के बीच जूझते रहे। शोर मचाने पर जैसे तैसे लोगों ने उनकी आवाज सुनी और लिफ्ट को जबरन खोलते हुए सांस लेने लायक जगह बनाई। कुछ दिन कुछ देर बाद और लोग इकट्ठे हुए जिन्होंने लिफ्ट को जबरन खोला और लिफ्ट में फंसे हुए बच्चें, महिला व परुषों को मौत के मुंह में से निकला।
लिफ्ट में फंसे अख्तर हुसैन चितौड़ा ने बताया लिफ्ट में कोई ऑपरेटर नहीं था। पंखा व लाइट भी लिफ्ट खराब होने के बाद बंद हो गए। एक बार तो जिंदगी की उम्मीद पूरी तरह छोड़ दी थी। लेकिन में महिलाओं की हिम्मत बंधाता रहा। बच्चे घबरा गए। करीब 15 से बीस मिनट की मशक्कत के बाद वेटिंग रूम में बैठे लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए लिफ्ट को हाथों से इतना खोल दिया जो सांस लेने लायक हवा आती रही। लिफ्ट में ना ही पंखा था ना ही कोई रोशनी का प्रबंध।
करीब 20 मिनट तक सब लिफ्ट में बंद रहे। तब जाकर कहीं सभी को सुरक्षित निकाला गया। सबसे बड़ी परेशानी मेडिकल कॉलेज में नेटवर्क की होती है। यहां से किसी का फोन भी नहीं मिलता। अख्तर हुसैन कहते हैं कि वो इसे नया जन्म मानते हैं। आज मौत को बहुत करीब से देखा। इलाज तो सही नहीं हुआ लेकिन मौत को मेडिकल में बहुत करीब से देख लिया।
समाजिक संगठन मेवात विकास मंच के महासचिव आसिफ अली कहते हैं की मेडिकल कॉलेज समस्याओं का गढ़ बन चुका है । यहां अधिकारी से लेकर छोटे से छोटा कर्मचारी अपनी ड्यूटी के प्रति लापरवाही बरत रहा है। इस बारे में कई बार मौखिक और लिखित रूप में लोगों ने अवगत कराया है। लेकिन संबंधित मेडिकल अधीक्षक और निदेशक इसको लेकर तनिक भी गंभीर नहीं है। यहां इलाज व अन्य ड्यूटी के दौरान संबंधित अधिकारी व कर्मचारी घोर लापरवाही बरत रहे हैं । नए निदेशक के आने के बाद उम्मीद जगी थी कि कुछ नया होगा, लेकिन वह पुराने जैसे भी साबित नहीं हो रहे। उनके आने से हालात और खराब हुए हैं। सरकार को यहां ध्यान देना चाहिए।