कंगना ने नाराजगी जताते हुए कहा कि मेरी आवाज दबाई जा रही है। सत्य घटना नहीं दिखाने का दबाव बनाया जा रहा है, जबकि इसी विषय पर यह फिल्म है कि कैसे लोगों की आवाज इमरजेंसी के समय दबाई गई? फिर मुस्कराते हुए कहा कि अब खुद बताइए, बिजली कड़कने से तो नहीं मरीं इंदिरा गांधी कि पेड़ गिर गया, उससे ऐसा हुआ। किसी अपराध को धर्म से जोड़कर राजनीति करेंगे तो देश बंदूकों के रास्ते पर ही चलेगा। बहुत खून देखा है देश ने। हमें ये जानने का अधिकार है कि इमरजेंसी क्यों लगी?
हमारी पीढ़ी कायरों की नहींकंगना ने कहा कि अगर कुछ लोगों ने उम्मीद लगा रखी है कि देश के टुकड़े होंगे। धर्म के नाम अलग देश की मांग कर सरकार चलाएंगे तो बता दूं, हमारी पीढ़ी कायरों की नहीं है, जो बैठे-बैठे देखते रहेगी। अगर टुकड़े गैंग की बात सुनी जानी चाहिए तो मेरी फिल्म भी देखी जानी चाहिए। फिल्म आएगी तो मुझे उम्मीद है कि राष्ट्रवादी इस फिल्म को देखने जाएंगे। लोग सड़क पर आ गए हैं। देश को जलाने की धमकी देते हैं। इससे तो देश और पीछे चला जाएगा।
निजी काम के लिए भाजपा में फोन नहीं उठता
एक सवाल के जवाब में सांसद ने कहा कि सरकार हम लोगों के काम के लिए है। सरकार हमारे काम के लिए नहीं है। निजी काम के लिए कोई फोन नहीं उठाता, यही भाजपा की सच्चाई है। फिल्म को लेकर सरकार के समर्थन न मिलने पर उन्होंने कहा कि ये भी देखिए कि फिल्म किस पर बनाई है। लोगों को भी समझना चाहिए कि द कश्मीर फाइल्स को किसी पार्टी के एजेंडा के लिए नहीं थी, यह राष्ट्रवाद के लिए थी। इमरजेंसी फिल्म देखने के लिए अभी तक मेरी पार्टी से किसी ने मांग नहीं रखी है।
जितना दिमाग, उतना ही तो बोलेंगे
राहुल गांधी के भाजपा नफरत की राजनीति करती है वाले बयान पर सांसद ने कहा कि यह उनका निजी बयान है। देश आज नेशन फर्स्ट के नारे, राष्ट्रवाद, सबका साथ सबका विकास पर चल रहा है। कहां है नफरत? अब जितना दिमाग है, उतना ही तो वे बोलेंगे। मुझे उनसे कोई व्यक्तिगत बैर नहीं है। कोई गुस्सा नहीं है। उन्होंने और उनके परिवार ने देश का बहुत नुकसान किया है। इस तरह आज भी बात करते हैं। स्टाक मार्केट की जांच करा लो, अमेरिका को देश के मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए, इससे मेरा खून खौलता है। हमारा हक है कि देश इस परिवार के चंगुल से निकले, अब निकल भी चुका है।
मोदी के आने से बदली मेरी जिंदगी
कंगना ने कहा कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मेरी जिंदगी ने बड़ा टर्न लिया। उनके आने से हमें लगा कि देश और हिन्दू धर्म के लिए गर्व करना चाहिए। इससे पहले हिन्दी टाइप, देशभक्त टाइप बन चुके थे। इससे हम परेशान थे, इसीलिए मैं कहती हूं कि हमें स्वतंत्रता तब मिली जब अपने लोगों को चुना। इसे मानसिक स्वतंत्रता भी मैं कहती हूं। संसद में पहुंचने पर अब भी सीख रही हूं।