बेटी कर रही एमबीबीएस की पढ़ाई, पिता ने खोल लिया क्लीनिक
साहिबाबाद। औद्योगिक क्षेत्र साइट-4 के कड़कड़ मॉडल गांव व झंडापुर में करीब डेढ़ लाख की आबादी का इलाज रामभरोसे चल रहा है। हालात यह हैं कि लोगों को मजबूरी में झोलाछाप से दवाई लेनी पड़ती है। स्वास्थ्य विभाग के औचक निरीक्षण में सामने आया कि इलाके में किसी ने बंगाली डॉक्टरों से दवाइयों के नाम जान लिए तो कोई बेटी को एमबीबीएस की पढ़ाई कराकर खुद क्लीनिक खोलकर बैठ गया। नोडल अधिकारी ने चार झोलाछाप के खिलाफ लिंक रोड थाने में मुकदमा दर्ज कराया है।
टीएचए में सरकारी अस्पताल की मांग को लेकर लंबे समय से आरडब्ल्यूए और अन्य संगठनों द्वारा अभियान चलाकर की जा रही है। वसुंधरा सेक्टर- 6 और ज्ञानखंड में अस्पताल की जमीन भी चिन्हित हो चुकी है लेकिन अभी शासन स्तर पर मामला लंबित है। ऐसे में हिंडन पार क्षेत्र की आधी आबादी निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं। अब मध्यम, गरीब और असहाय परिवारों के इलाज के लिए जगह-जगह कई झोलाछाप ने क्लीनिक भी खोल लिए हैं। सात मार्च को स्वास्थ्य विभाग की टीम ने कड़कड़ मॉडल गांव में सुमित के मोनिका क्लीनिक, एसके पंडित और झंडापुर में आदर्श क्लीनिक पर मोहम्मद जैब व जफर आलम के क्लीनिक पर औचक निरीक्षण किया था। अधिकारियों ने इन सभी से इलाज करने के लिए डिग्री दिखाने के लिए कहा लेकिन वह लोग कोई कागजात नहीं दिखा पाए। इसके बाद अधिकारियों ने सभी को नोटिस जारी कर 72 घंटे में चिकित्सकीय प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने का समय दिया। कोई डिग्री न मिलने पर विभाग के अधिकारियों ने कार्रवाई की। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि चारों लोग अवैध रूप से चिकित्सा संबंधी अभ्यास कर लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। विभाग ने इन सभी को अशिक्षित, अयोग्य और झोलाछाप मानकर लिंक रोड थाने में इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट 1956 की धारा 15 (2), 15 (3), इंडियन मेडिसिन सेंट्रल काउंसिल एक्ट-1970 की धारा 17 व यूनाइटेड प्रोविजन मेडिकल एक्ट 1971 की धारा-30 के अलावा भारतीय दंड विधान की धारा 420 के तहत मुकदमा दर्ज कराया है। थाना प्रभारी बिजेश सिंह का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग के नोडल अधिकारी ने मुकदमा दर्ज कराया है, आरोपी अभी फरार हैं उनकी तलाश में टीम जुटी है।
कार्रवाई के डर से नहीं लिखते नाम और पता
स्थानीय लोगों का कहना है कि झोलाछाप किराए पर दुकान लेकर बुखार, खांसी, जुकाम, सूजन, पेट दर्द, सीने में दर्द, निमोनिया समेत अन्य बीमारियों का इलाज कर देते हैं। यही नहीं, इनके संपर्क में कई लैब के कर्मी भी होते हैं जो टेस्ट करने के बाद रिपोर्ट देकर दवाइयों के नाम भी बताते हैं। इससे झोलाछाप के अलावा लैब वालों का भी काम चलता रहता है। दो झोलाछाप ने अपने क्लीनिक पर नाम और पता के अलावा कोई संपर्क नंबर भी नहीं लिखा था। उन्हें डर रहता है कि स्वास्थ्य विभाग की तरफ से कभी भी कार्रवाई हो सकती है।
50 से 200 रुपये तक वसूलते हैं फीस
कड़कड़ मॉडल गांव के लोगों का कहना है कि झोलाछाप इलाज के नाम पर 50 से लेकर 200 रुपये तक फीस वसूलते हैं। इनके पास ज्यादातर गरीब और असहाय लोग पहुंचते हैं, जो बड़े अस्पताल में इलाज कराने के लिए समर्थ नहीं होते हैं। इनका आसपास कालोनियों में मेडिकल स्टोर संचालकों से भी गठजोड़ होता है। वह संचालक से उपलब्ध दवाइयों के नाम पता करके मरीज के लिए पर्ची में उसी दवाई को लिखते हैं। इसमें उन्हें कमीशन भी मिलता है।
चिकित्सा विभाग के नोडल अधिकारी डॉ. जी.पी मथुरिया का कहना है कि चारों झोलाछाप के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है। उन्होंने नोटिस के बावजूद चिकित्सकीय प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया।