गांव न जा पाने के बावजूद सेहतपुर का परिवार निभा रहा परंपरा
काजल कुमारी
फरीदाबाद। उत्तराखंड की संस्कृति और लोक परंपराएं आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं, भले ही वे गांव से दूर शहरी जीवन जी रहे हों। सावन महीने में मनाया जाने वाला हरेला पर्व सेहतपुर निवासी चेतन और उनका परिवार शहर में रहकर भी पारंपरिक ढंग से मना रहा है। इससे उत्तराखंड के लोक पर्व की खुशबू अब शहर में भी फैलने लगी है।
चेतन ने बताया कि वह मां ममता देवी और पत्नी आरती संग हर साल हरेला के अवसर पर गांव जाना पसंद करते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से व्यस्तता और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण गांव जाना संभव नहीं हो पा रहा। ऐसे में वह त्योहार को शहर में रहकर ही मना रहे हैं। उन्होंने बताया कि हरेला से दस दिन पहले मिट्टी के पात्र में गेहूं के बीज बोए जाते हैं, जिन्हें रोज पानी दिया जाता है। त्योहार के दिन इन अंकुरित गेहूं को हरेला कहा जाता है, जिन्हें लकड़ी की डंडी पर बांधकर आंगन में फहराया जाता है। इस दौरान पूरे परिवार के सदस्य पारंपरिक वेशभूषा में पूजा करते हैं।
चेतन ने आगे बताया कि त्योहार के दिन गांव में रहने वाले अपने परिजनों से वीडियो कॉल के माध्यम से जुड़ते हैं, उन्हें बधाई देते हैं और वहां हो रही पूजा को भी स्क्रीन पर देखते हैं। उनका मानना है कि भले ही वे शारीरिक रूप से गांव न पहुंच सकें, लेकिन भावना और तकनीक के सहारे वे परंपरा से जुड़े रहना नहीं छोड़ते।