जिन मासूमों को कानून भी अपराधी नहीं ठहरा सकता, ऐसे 9 बच्चे नीमका जेल मेें सजा काटने को मजबूर हैं। उनका गुनाह सिर्फ इतना है कि वह एक अपराधी या आरोपी मां की कोख से जन्मे हैं।
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इनमें से कई तो जन्म होने के कुछ दिन बाद ही मां के साथ जेल भेज दिए गए। अपराधियों की बस्ती यानी जेल में इन बच्चों का स्वस्थ शारीरिक, मानसिक विकास सामान्य बच्चों की तरह हो पाएगा, यह कहना मुश्किल है।
वजूद इसके जेल प्रशासन इन बच्चों को अच्छी परवरिश के लिए अंदर ही क्रच चला रहा है। नीमका जेल में विभिन्न अपराधों में 62 महिलाएं बंद हैं। इनमें से आठ महिलाएं अपने नौ बच्चों के साथ जेल में रह रही हैं। बिना अपराध मां के साथ सजा काट रहे चार बच्चे तो दुधमुंहे हैं।
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इन बच्चों के लिए उनकी मां और सजा काट रही अन्य महिलाएं ही परिवार हैं और जेल उनका घर। सामान्य बच्चों से दूर इन बच्चों का दिन सुबह जेल में कैदियों को जगाने वाली घंटी के साथ शुरू होता है।
कैदी मां तो अपने कामों में लगा दी जाती हैं और बच्चे उनसे अलग हो जाते हैं। यह बच्चे भी सामान्य बच्चों की तरह फले फूलें, इसकी जिम्मेदारी जेल प्रशासन उठा रहा है।
बैरक को बनाया क्रेच
- फोटो : अमर उजाला
एक बैरक को बच्चों के क्रेच का रूप दिया गया है। पढ़ी लिखी महिला कैदी यहां बच्चों को खेल-खेल में गिनती, अक्षर ज्ञान, सामान्य व्यवहार की बातें सिखाती हैं। बड़े बच्चों के लिए किताब-कॉपियां भी उपलब्ध हैं, लेकिन इनकी परीक्षा नहीं होती, क्योंकि जेल में स्कूलिंग की सुविधा नहीं है।
छह साल से अधिक उम्र के बच्चों को जेल से बाहर सरकारी स्कूलों या एनजीओ संचालित स्कूल में एडमिशन दिलाया जाता है। जेल प्रशासन के मुताबिक नौनिहाल से लेकर छह साल तक के बच्चों को मां के साथ जेल में रखे जाने का प्रावधान है।
जिन महिलाओं के परिवार वाले नहीं हैं या परिवार वाले उनके बच्चों को साथ नहीं रखना चाहते, ऐसी कैदियों के बच्चे उनके साथ रह रहे हैं। जेल के माहौल का असर इन बच्चों पर न पड़े, इसके लिए क्रेच की सुविधा उपलब्ध कराई गई है।
इसमें शिक्षित महिला कैदी ही बच्चों को शिक्षा देती हैं। -दीपक शर्मा, नीमका जेल अधीक्षक यह सही है कि बच्चे बेगुनाह हैं, लेकिन नेचुरल जस्टिस के तहत उन्हें मां से अलग नहीं किया जा सकता। कानून बनाते समय इन मुद्दों को ध्यान में रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे बच्चों की बेहतर परवरिश के लिए जेल में क्रेच बनाने का प्रावधान किया है। बच्चे वाली मां की सजा कम करने का प्रावधान तो कानून में नहीं है, लेकिन कई ऐसे केस हैं, जिनमें अपराधी को उनके घर में ही कैद किया गया, लेकिन यह सामान्य नहीं है। - पद्मश्री डॉ. ब्रह्मदत्त, एडवोकेट, सुप्रीमकोर्ट
पार्क ग्रुप हॉस्पिटल की कंस्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. राषि आहूजा का कहना है कि जेल के माहौल में बच्चों का स्वस्थ मानसिक विकास होना मुश्किल है। बाहर की दुनिया का सामाजिक जीवन इन बच्चों को नहीं मिल पाता, जिससे इनमें आत्मविश्वास की कमी हो जाती है।
बच्चों के मानसिक विकास उसी उम्र के बच्चों के साथ खेलने, पढ़ने में होता है। ऐसे बच्चे स्कूल से वंचित रहते हैं, जिससे इनका शारीरिक और मानसिक विकास सामान्य रूप से नहीं हो पाता।
समाज में वापस लौटने पर यह बच्चे कुंठा, दबाव आदि का शिकार हो सकते हैं। जेल के सीमित क्षेत्र में रहने से उनकी सोच भी विकसित नहीं हो पाती है। इसके अलावा बच्चों की परिस्थितियों से निपटने की शक्ति भी प्रभावित होती है और भाषा शैली भी कमजोर रहती है।