फरीदाबाद। हिंदी माध्यम में बोलने वालों को अपनापन का सलीका आता है। हिंदी सशक्त और अपनेपन का अहसास कराने वाली भाषा है। जीवन भर जिंदगी नेताओं-साहित्कारों ने माना है कि हिंदी के बिना हिंदुस्तान नहीं। वहीं आज भी बच्चों के लिए मैंगो-बनाना के बजाय आम-केला अपनापन का भाव है। यह बातें अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के तहत जिले में हिंदी के प्रबुद्ध वर्ग में माने जाने वाले दो सेवानिवृत्त प्रवक्ताओं ने कहीं।
उन्होंने बताया कि हिंदी को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित भाषा सिद्ध किया जा चुका है। पूरे देश में नई पीढ़ी को हिंदी व अंग्रेजी का मिश्रण (हंग्रेजी) से जोड़ा जा रहा है। बावजूद इसके आज भी नई पीढ़ी मैंगो और बनाना को आम और केला कहकर ही सुखद महसूस करती है। यह हिंदी का अपनापन है। इसी अपनेपन को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
करीब 16 साल हिंदी पढ़ाकर सेवानिवृत्त हुए प्रवक्ता एसके दलाल बताते हैं कि बच्चों में हिंदी को लेेकर कहीं कोई संकोच नहीं। वह बस हिंदी को लेकर गंभीर नहीं। बच्चे इस भाषा से अपनी मां जैसा जुड़ाव महसूस करते हैं। बस जरूरत है कि हिंदी के वैज्ञानिक व पेशेवर इस्तेमाल बच्चों को समझाएं जाएं। एसके दलाल मानते हैं कि सटीक हिंदी बोलते वक्त आते हैं सशक्त विचार बात में आते हैं। हिंदी एक सीधी सपाट सधी हुई भाषा है। इसे डिजिटल माध्यम से बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
वहीं राजकीय महिला कॉलेज से प्राचार्या पद से सेवानिवृत्त बी राजपूत मानती हैं कि कंप्यूटर युग में भी हिंदी और संस्कृत से जैसा तर्कपूर्ण भाषा नहीं हैं। उन्होंने 21 साल तक हिंदी प्रवक्ता के रूप में हिंदी को बढ़ावा दिया। वह बताती हैं कि भात में भाषाई पहलू में अनेकता को एकता का स्थान हिंदी से मिलता है। अन्य कोई ऐसी भाषा नहीं जो पूरे देश में विभिन्नता के बावजूद प्रिय हो, अपनाई गई हो।
डिजिटल माध्यमों में भी हिंदी का बोलबाला
बी राजपूत बताती हैं कि आजकल भाषाई सीमा को खत्म करने का प्रयास ई-कंपनियां भी कर रही हैं। वह डिजिटल माध्यम में न केवल अंग्रेजी को साथ ग्राहकों तक पहुंचीं, बल्कि हिंदी को एक व्यापक माध्यम के रूप में अपनाया। आज लगभग सभी डिजिटल माध्यम में हिंदी बोलने-लिखने व सुनने का विकल्प दिया जा रहा है। यह भाषा के महत्व व पहुंच को दर्शाता है। इसी के साथ नए भारत को आगे बढ़ने की जरूरत है।