भूजल स्तर के मामले में प्रदेश ‘डार्क जोन’ में जा रहा है। विकास की दौड़ में आगे प्रदेश का भूजल स्तर बीते 42 वर्ष में 60 फीट नीचे जा पहुंचा है। गिरते भूजल स्तर को रोकने के लिए न तो सरकार गंभीर है और न ही आम आदमी।
इसी का नतीजा है कि गुड़गांव, फतेहाबाद, फरीदाबाद, कैथल, रेवाड़ी जिले में भूजल स्तर औसतन 88 फीट से नीचे गिरा है। जबकि इन जिलों के शहरी क्षेत्र में यह 120 फीट से नीचे पहुंच चुका है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड और प्रदेश सरकार भूजल स्तर को सुधारने की कवायद भले ही कर रही हो, लेकिन नतीजा सिफर है। हरियाणा में पानी के अंधाधुंध दोहन से भूजल स्तर गत 10 सालों में 26 फीट नीचे चला गया है।
सूबे का 60 फीसदी इलाका डार्क जोन में शामिल हो गया है। गुड़गांव और महेंद्रगढ़ जिलों में ट्यूबवेल का कनेक्शन जारी करने में विशेष सावधानी बरती जा रही है। प्रदेश में वर्ष 2000 में भूजल औसतन 31 फीट पर उपलब्ध था।
जो अब 60 फीट के पार मिल रहा है। सबसे बुरा हाल कुरुक्षेत्र, गुड़गांव, महेंद्रगढ़ का है। यहां 90 फीट के करीब है। प्रदेश में 36 मिलियन एकड़ फुट पानी की जरूरत है, लेकिन उपलब्धता 14 मिलियन एकड़ फुट है।
विशेषज्ञों की मानें तो 2008 से वैज्ञानिक हरियाणा में गंभीर संकट पैदा होने की चेतावनी दे रहे हैं, इसके बावजूद ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। हरियाणा में इस संकट के मूल में वैज्ञानिक खेती के खराब व्यवहार और एनसीआर से सटे जिले में बेतरतीब विकास में पानी का अंधाधुंध दोहन है।
हरियणा में तेजी से औद्योगीकरण हुआ है जिससे पानी की खपत बढ़ी है। खेती के पैटर्न में बदलाव अब हरियाणा को ही भारी पड़ने लगा है। जिला भूजल वैज्ञानिक एमएस लांबा बताते हैं भूजल स्तर के लगातार नीचे जाने के कारण तलाशे गए तो पता चला कि बारिश में भूमिगत जल में जितना सुधार होता है। उससे कहीं ज्यादा उसका दोहन कर लिया जाता है। गुड़गांव में बंदिश के बाद गिरावट की गति धीमी हुई है। अब अवैध ट्यूबवेल पर भी कार्रवाई की जा रही है।