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Delhi NCR News: दिन में दो घंटे घर से बाहर रहेगा बच्चा तो नहीं चढ़ेगा चश्मा

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एम्स ने स्कूलों में पढ़ने वाले पांच से 15 साल के तीन हजार बच्चों पर किया अध्ययन
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02 : ग्रुप में बांटे गए थे बच्चे शोध के लिए
राकेश शर्मा
नई दिल्ली। यदि आपका बच्चा दिन में दो घंटे घर से बाहर सूरज की रोशनी में रहता है तो उसमें दृष्टिदोष होने की आशंका कम हो जाती है। एम्स के नेत्र विज्ञान विभाग के शोध से इसका पता चला है। कोरोना महामारी के बाद छोटे बच्चों की आंखों में प्रोग्रेसिव मायोपिया (दृष्टिदोष) के मामले बढ़ रहे हैं। इसको देखते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंटर में बाल नेत्र विज्ञान विभाग के डॉक्टरों ने दिल्ली के 22 सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले तीन हजार बच्चों पर शोध किया।
शोध के दौरान इन बच्चों को दो ग्रुप में बांटा गया। आधे बच्चों की दैनिक जीवन शैली सामान्य रही,जबकि आधे को दिन में आधे घंटे और सप्ताह में पांच दिन कमरे से बाहर ले जाकर बैठाया गया। दो साल तक लगातार ऐसा किया गया। साथ ही बच्चाें की आंखों में होने वाले बदलाव, सेहत व अन्य पर नजर रखी गई। तीन साल बाद सभी बच्चों का मूल्यांकन किया गया। इस दौरान पाया गया कि जो बच्चे आधे घंटे धूप या सूरज की रोशनी में रहे, उनकी आंखें बंद कमरे में रहने वाले बच्चों के मुकाबले ज्यादा स्वस्थ पाई गई। साथ ही उनकी आंखों में दृष्टिदोष भी स्थिर या कम हुआ।
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शोध से जुड़े एम्स के बाल नेत्र विज्ञान विभाग के डॉ. रोहित सक्सेना का कहना है जो बच्चे सूरज की रोशनी के संपर्क में रहते हैं उनमें दृष्टिदोष होने की आशंका कम रहती है। शोध के दौरान आधे बच्चों को कमरे से बाहर निकालकर शरीर के अनुकूल सूरज की रोशनी में रखा गया। गर्मी होने पर पेड़ की छांव में योग या खेल में शामिल किया गया। इस शोध से पता चला कि सूरज की रोशनी की मदद से आंखों में होने वाले दृष्टिदोष को रोका या स्थिर किया जा सकता है। ऐसे में यदि बच्चे दो घंटे सूरज की रोशनी में रहते हैं तो उनकी आंखों में दृष्टि दोष होने की आशंका घट जाती है।

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दृष्टि दोष के लक्षण
- बच्चे यदि आंखों को सिकोड़ते हों
- आंखों को बार-बार मलते हो
- दूर से शब्दों को न देख पाए

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आंखों को बचाने ने लिए क्या करें - कम रोशनी में न पढ़े
- किताब को उचित दूरी पर रखे
- पढ़ाई के दौरान हर आधे घंटे के बाद आंखों को आराम दें
- बच्चों को केवल पढ़ाई के लिए फोन दें, साथ ही रखें नजर


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20 साल में तीन गुना हो गई आंखों की समस्या

आरपी सेंटर के प्रोफेसर डॉ. प्रवीण वशिष्ठ का कहना है कि पिछले 20 सालों में छोटे बच्चों में दृष्टिदोष की समस्या तीन गुना हो गई है। साल 2001 में 5 से 15 साल की उम्र में केवल सात फीसदी बच्चों में दृष्टि दोष की समस्या दिखती थी। इन्हें चश्मा लगाने की जरूरत पड़ती थी। वहीं मौजूदा समय में यह आंकड़ा बढ़कर 20 फीसदी हो गया गया है। जिस गति से बच्चों में दृष्टिदोष की समस्या बढ़ रही है वह काफी चिंता का विषय है। ऐसे में जांच के लिए आंखों की जांच की क्षमता को बढ़ाना होगा। देश में हर साल दो करोड़ स्कूल के बच्चों चश्मा की जरूरत है। हमें हर साल बच्चों के आंखों की जांच करवानी चाहिए।

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कोरोना के बाद स्थिति गंभीर
डा. वशिष्ठ ने कहा कि कोरोना महामारी के बाद बच्चों में दृष्टि दोष की समस्या विकराल हो रही है। पहले 10 साल के बच्चों में चश्मा चढ़ाने की जरूरत पड़ती थी। लेकिन अब पांच साल के बच्चों में समस्या दिख रही है। कोरोना के बाद बच्चों में स्क्रीन समय बढ़ गया है। ऐसे में परिवार को सुझाव दिया जाता है कि बच्चों की पहुंच से फोन को दूर रखा जाए।
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चश्मा मिलने पर बढ़ सकती है देश की जीडीपी
डॉ. वशिष्ठ ने बताया कि देश में जांच के बाद चश्मा देने से जीडीपी बढ़ने का अनुमान है। विजन इंडिया की मदद से बांग्लादेश में 20 लाख लोगों को जांच के बाद चश्मा दिया गया। इनके बाद इन लोगों के काम करने की क्षमता की जांच की गई। जांच के बाद पाया कि इनकी आय 33 फीसदी बढ़ गई है। वहीं, अन्य डॉक्टर ने बताया कि देश में बुनकर, ट्रक चालक व अन्य की जांच कर यदि चश्मा वितरित किया जाए तो लोगों की आय और काम की गुणवत्ता बढ़ेगी। इसकी मदद से देश की जीडीपी 6 फीसदी तक बढ़ सकती है। एक अनुमान बताता है कि जांच के बाद देश में 55 करोड़ लोगों को चश्मे की जरूरत है।
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