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यहां हर तीसरी रेप पीड़िता नाबालिग, मासूमों से भी दरिंदगी

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औद्योगिक शहर में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों से उनकी सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है। इस शहर में पांच साल की मासूम बच्चियां तक यौन हिंसा का शिकार बनाई गईं।
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हालात यह हैं कि यहां हर तीसरी दुष्कर्म पीड़ित कोई नाबालिग होती है। महिलाओं के प्रति अपराध के लिए बदनाम इस शहर में यौन अपराधी मासूम बच्चियों से छेड़छाड़ और अश्लील हरकतें करने से भी नहीं चूकते।

हालांकि पुलिस ने कार्रवाई करते हुए इनमें से अधिकतर आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बावजूद चिंता की बात यह है कि बच्चियों के प्रति यौन हिंसा की बढ़ती मानसिकता पर अंकुश नहीं लग पा रहा।
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पुलिस आयुक्त कार्यालय से मिले आंकड़ों के मुताबिक इस साल 1 जनवरी से 30 नवंबर तक 157 लोग दुष्कर्म का शिकार हुईं। इनमें से 50 पीड़ित नाबालिग हैं।

कोई जान पहचान का व्यक्ति ही करता है गलत हरकत

विस्तार में जाने पर पता चला कि पांच साल से कम उम्र की चार अबोध बच्चियों को भी दुष्कर्म का शिकार बनाया गया, जबकि 17 बच्चियां ऐसी हैं जिनकी उम्र 12 साल से कम है।

यानी यौन उत्पीड़न का शिकार हुईं लगभग आधी बच्चियों को यह मालूम भी नहीं था कि उनके साथ क्या हुआ। महिला थाना सूत्रों के मुताबिक इन पीड़ितों में एक 13 वर्षीय बच्ची गर्भवती है।

दुष्कर्म के अलावा इस साल छेड़छाड़, अश्लील हरकतों के 146 केस दर्ज किए गए। इनमें भी 28 बच्चियां शारीरिक छेड़छाड़ और अश्लीलता का शिकार बनीं।

महिला थाने की एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि नाबालिगों से अधिकतर कोई जान पहचान का व्यक्ति ही गलत हरकत करता है। अधिकतर मामलों में बच्चियों से दुष्कर्म  का प्रयास किया गया।

ऐसे में बच्चियां उनकी आसान शिकार होती हैं

समाजशास्त्री बलजीत कौर कहती हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी की वजह से युवाओं में यौन अपराध की घटनाएं बढ़ रही हैं। इस दौर में युवाओं को इंटरनेट पर अश्लील और प्रतिबंधित कंटेंट एक क्लिक पर हासिल हो जाते हैं।

अश्लील साहित्य, वीडियो आदि देखने के बाद ऐसे लोग फंतासी में खो जाते हैं और उसे सच करने के लिए अपना शिकार ढूंढते हैं। ऐसे में बच्चियां उनकी आसान शिकार होती हैं।

बलजीत कौर कहती हैं कि परिवार के बड़े लोगों को चाहिए कि बच्चों खास कर किशोरों को समय दें, उनकी दिनचर्या और इंटरनेट पर एक्टिविटी पर नजर रखें कि कहीं वह गलत कंटेट तो नहीं देख रहे हैं।

पुलिस के मुताबिक महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध में आरोपियों की गिरफ्तारी तुरंत की जाती है। शहर में जितने भी केस दर्ज किए गए उनमें 95 फीसदी से ज्यादा आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। समाज के जागरूक होने पर ही यौन हिंसा की घटनाओं पर रोक लग सकती है, पुलिस तो अपराध होने के बाद ही कार्रवाई करती है।
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मानसिक आघात ने छीन ली बचपन की मुस्कुराहट

खेलने और पढ़ने की उम्र में यौन हिंसा का शिकार हुईं कई बच्चियों के चेहरे से मुस्कान गायब हो चुकी है। अपने स्कूल में पढ़ाई में अव्वल रहने वाली नौ साल की बच्ची एक दिन हुए हादसे के सदमे से अब तक उबर नहीं पा रही है।

घर में दुबके रहना, बात-बात पर रोना, हर एक व्यक्ति को शक की नजर से देखना उसकी आदत बन चुकी है। यह हालत सिर्फ एक बच्ची का ही नहीं है, यौन हिंसा की शिकार हुई ज्यादातर बच्चियां कमोबेश इन हालात से गुजर रही हैं।

एशियन हॉस्पिटल की सीनियर कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट (मनोचिकित्सक) डॉ. मीनाक्षी मनचंदा कहती हैं कि यौन हिंसा का शिकार हुईं अबोध बच्चियों का मानसिक विकास बाधित हो जाता है। उनमें तनाव, चिड़चिड़ापन, बात-बात पर रोने की प्रवृत्ति, अपने आप में खोए रहना, किसी से बात नहीं करना, असुरक्षा जैसे लक्षण आम होते हैं।

उनका कहना है कि ऐसी बच्चियों को लगातार देखभाल और संबल देने की जरूरत होती है। परिजनों को चाहिए कि उसके सामने घटना की बात न कर उसे पढ़ाई, खेलकूद आदि सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करें। इसके बावजूद यदि बच्चे में बदलाव नहीं आए तो मनोचिकित्सक की काउंसलिंग जरूरी है। कुछ केस में दवा का इस्तेमाल तक करना पड़ सकता है।
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