अरावली की पहाड़ियों और जंगलों को काटकर सैकड़ों की संख्या में लोगों ने फार्म हाउस का निर्माण कराया। इससे जंगली जानवरों का घर छिन गया। जो बाहर दिखते थे उन्हें मार दिया जाता था।
गुड़गांव मंडल के पूर्व कंजरवेटर व पर्यावरणविद् आरपी बलवान बताते हैं कि मानेसर, दमदमा, रायसीना और भोड़सी में कई प्रजातियों के वन्यजीव रहते थे।
मगर जंगलों की कटाई और फार्म हाउसों के विकास के कारण वाइल्ड लाइफ श्रृंखला अब तकरीबन समाप्त हो गई है। उन्होंने बताया कि अरावली के जंगलों में उन्होंने खुद चीता, बाघ, शेर, लकड़बग्घा, भेड़िया, सियार और काला हिरण देखा था।
कौन है प्रमुख शत्रु?
तकरीबन डेढ़ दशक पहले अरावली की वादियां वन्यजीवों से गुलजार रहा करती थीं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अरावली के जंगलों में विभिन्न प्रजातियों के जानवरों की अच्छी खासी तादाद हुआ करती थी।
बाघ और काला हिरण जैसे जीव अब किस्से-कहानियों के ही विषय बनते जा रहे हैं। माइनिंग के कारण भी जंगलों को नुकसान पहुंचा। अवैध रूप से फार्म हाउसों का निर्माण बड़ी तेजी से हुआ।
2002 में तेंदुओं की गिनती हुई थी
वर्ष 2002 में उन्होंने 12 तेंदुओं की गिनती कराई थी। मानेसर में तीन बच्चे और दो नर-मादा थे। वहीं मेवात में दो और बाकी के दमदमा और सोहना के नांगली पहाड़ियों में थे। अब या तो इन्हें मार दिया गया या खुद मर गए।
वन्य जीव विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 2002 तक अरावली के जंगलों में वन्यजीवों की संख्या भरपूर थी। उसके बाद ही जंगलों की कटाई और अरावली का खनन होने लगा।
कैसे पकड़ते हैं जानवरों को?
पर्यावरणविद् आरपी बलवान ने बताया कि अरावली क्षेत्र में फार्म हाउस बनाने वालों ने जगह-जगह पर पिंजरा लगवा रखा है। कई स्थानों पर अभी भी यह मिल जाएगा। पहले ये सैकड़ों की संख्या में लगाए गए थे।
इन पिंजरों में फंसने वाले वन्यजीवों को बेच या मार दिया जाता था। बलवान ने बताया कि कंजरवेटर रहते हुए उन्होंने कई बार इस पर अंकुश लगाने का प्रयास किया, लेकिन ज्यादा सफलता नहीं मिली।
क्यों विलुप्त हुए जानवर?
जंगलों के कटने से जानवरों का ठिकाना छिन गया। खाने की खोज के लिए उन्हें आबादी वाले क्षेत्रों में पलायन करना पड़ा। जानवरों को बेदर्दी से मारा गया। घास और पेड़ों की पत्ती खाने वाले जानवर भूखे मरने लगे।
जंगल विहीन होने के बाद जानवरों को बीमारियों ने घेर लिया। कुछ तेंदुए दमदमा के रास्ते दिल्ली की ओर पलायन कर गए। खरगोश सहित 40 प्रजातियों के रेपटाइल समाप्ति की कगार पर हैं।
अब तो पक्षी भी नहीं दिखते
अरावली के जंगलों की कटाई के कारण यहां कई प्रकार के पक्षियों की प्रजातियां विलुप्त होने लगी हैं। गौरैया, चील, कौवा सहित अन्य कई प्रकार के पक्षी खत्म होने लगे हैं।
सिर्फ सुल्तानपुर राष्ट्रीय पक्षी उद्यान ही है, जहां हर वर्ष कई प्रजातियों के पक्षियों का दीदार होता रहता है। जंगलों के कटने से जानवरों का ठिकाना छिन गया। खाने की खोज के लिए उन्हें आबादी वाले क्षेत्रों में पलायन करना पड़ा।