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पाक कला प्रतियोगिता: दादी-नानी के जमाने का खाना, जो अपनी थाली से कहीं गुम हो गया, देश के 35 स्थानों से आई महिलाओं ने दिखाया हुनर

Tue, 29 Mar 2022 01:25 AM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

निर्णायकों के लिए यह तय कर पाना मुश्किल था कि किसका खाना कितना अच्छा है। इस प्रतियोगिता में मध्य प्रदेश के नेवाड़ से आईं निशा चौहान ने प्रथम स्थान, राजस्थान की राधा गोस्वामी को द्वितीय और फरीदाबाद की पारुल गोयल को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ।
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पाक कला प्रतियोगिता - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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दादी-नानी के जमाने का खाना, अपनी थाली से कहीं गुम हो गया था। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में हुई पाक कला प्रतियोगिता में फिर से लोगों की थाली में परोसा गया। इन पकवानों को अलग-अलग शहरों से आईं 35 हुनरमंद महिला प्रतिभागियों ने बनाया था। इन्होंने बड़े जतन से इन पकवानों को बनाने की विधि खोज निकाली और खान पान के विशेषज्ञों के सामने परोस कर आश्चर्यचकित कर दिया। 

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संभ्रांत होटलों में शेफ के तौर पर काम कर रहे वैभव भार्गव, निशांत चौबे, इज्जत हुसैन, विमल धर, तनुज, स्मृति, नंदिनी, संगीता, बिनीता और रीना ने प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका निभाई और इन महिलाओं के हाथों का करामात देखर आश्चर्यचकित रहे। दादी नानी के जमाने के खाने स्वादिष्ट और देखने में आकर्षक थे।

सभी 35 प्रतिभागियों को मिले गिफ्ट हैंपर
निर्णायकों के लिए यह तय कर पाना मुश्किल था कि किसका खाना कितना अच्छा है। इस प्रतियोगिता में मध्य प्रदेश के नेवाड़ से आईं निशा चौहान ने प्रथम स्थान, राजस्थान की राधा गोस्वामी को द्वितीय और फरीदाबाद की पारुल गोयल को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। पहले स्थान के लिए 21 हजार, द्वितीय के लिए 15 हजार और तृतीय स्थान के लिए 11 हजार रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया। इसके अलावा बाकी प्रतिभागियों को भी गिफ्ट हैंपर दिया गया।
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बबीता का सपना साकार कर रहे कर्नल सक्सेना
स्वस्थजीवन शैली और भारतीय कला-संस्कृति को बढ़ावा देने केलिए बबीता सक्सेना ने 2016 में मुहिम शुरू की। उन्होंने दादी-नानी के जमाने के खाने-खजाने को दोबारा जन मानस के बीच स्थापित करने की कोशिश शुरू की। लेकिन कोरोना महामारी में वह दुनिया को अलविदा कह गईं। इसके बाद उनके इस सपने को उनके पति कर्नल अतुल सक्सेना आगे बढ़ा रहे हैं। 

लंबा सफर तय कर दिल्ली पहुंचीं महिलाएं
'कहीं गुम ना हो आए',पाककला प्रतियोगिता की शुरुआत दिल्लीके अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, ओड़िशा, पंजाब, बंगाल के विभिन्न शहरों में हुई। इसका ग्रैंड फिनाले सोमवार को आईजीएनसीए में आयोजित हुआ। इसमें हर राज्य से विजेता प्रतिभागियोंने हिस्सा लिया और बढ़चढ़कर अपने कुकिंग हुनर काप्रदर्शन किया। इन्होंने यह भी दिखाया कि कुकिंग बहुत हीखूबसूरत कला है। हमअपने अनाज से बने भोज्य पदार्थों को पौष्टिकताऔर स्वास्थ्य प्रद होने के साथ बहुत ही खूबसूरत तरीके से परोस सकते हैं। 

स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर सबको खिलाया
. बुंदेलखंड़ी खाना मेहरी, मीड़ा, खड़ई का रायता, पनबुड्ढे की कढ़ी, सूखी बूंदी, बेढ़नी और सत्तू बनाकर ले आए, पहली बार इस प्रकार के इवेंट का हिस्सा बनकर बहुत खुश हूं। - मुक्ता जैन, कानपुर

. यहां दादी-नानी की थाली लेकर आई थी, इसमें चूनी की रोटी, गुड़-बरा, धोवन की कढ़ी, करोब और उम्मी शामिल है, इन व्यंजनों को घर में बचे अनाज के अंश से बनाया है। - प्रतिमा बरनवाल, आजमगढ़

. पेठे की बड़ी, कमल ककड़ी की सब्जी, छोलया की कढ़ी, कपूर कंद, कच्चे आम का पना, जौ की रोटी, हींग का अचार सबको खूब पसंद आया, ये दादी-नानी की सात्वित थाली है, जिसको बिना लहसन-प्याज के बनाया है।  - जया भरद्वाज, बरेली

. मारवाड़ी स्पेशल थाली में औलिया, झांझरिया, चांदलिया सब्जी, राबोड़ी की सब्जी, ग्वारपाटा और मेथी की सब्जी बनाकर लाई, कभी राजस्थान में यह राजा माहाराजाओं और आम लोगों दोनों का खाना था। - रेशमा वर्मा, बीकानेर

मधुबनी और लिप्पन कला बनी पहचान
गाजियाबाद के मुरादनगर की मंजू सिंह मधुबनी, वरली और लिप्पन कला से अपना परिचय करा रही थीं। वह यहां लकड़ी पर ह्वाइट सीमेंट, मिट्टी से चित्रकारी कर करीब 50 कलाकृतियों को ले आई थीं। इसमें मिट्टी से निर्मित कई बर्तन भी थे, जिनपर उन्होंने अपनी हस्तकला की छाप छोड़ी है।

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