उच्च न्यायालय ने एक महिला दोषी को राहत देते हुए उसे जमानत की शर्तो में संशोधन करते हुए निजी मुचलके पर रिहा करने का निर्देश दिया है। महिला जमानती पेश करने में असमर्थ थी। न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने अपने फैसले में कहा कि दोषी को मात्र इस आधार पर लंबे अरसे तक जेल में नहीं रखा जा सकता कि वह जमानत पेश नहीं कर सकती।
शहनाज नाम की महिला को 2013 के एक मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी और अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम की धारा 6 के तहत दोषी ठहराया गया था। उसे सात साल के कठोर कारावास और एक लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
जनवरी 2022 तक उसकी शेष सजा लगभग 2 वर्ष रह गई थी। उच्च न्यायालय ने उसकी अपील के निपटारे तक उसे 19 जनवरी, 2022 के आदेश के तहत 25 हजार रुपये के जिनी मुचलके व दो अन्य दो जमानती पेश करने की शर्त पर सजा निलंबित कर दी थी।
मार्च में शहनाज ने जनवरी के आदेश में संशोधन की मांग करते हुए एक आवेदन दायर करके फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाया। उसने तर्क रखा कि वह न तो 25 हजार रुपये का निजी मुचलके का प्रबंध कर पाई न ही परिवार का कोई सदस्य उसकी सहायता के लिए आगे आया। अदालत ने जमानत की शर्त में संशोधन करते हुए उसे 25 हजार रुपये की अपेक्षा 15 हजार रुपये का निजी मुचलका व दो जमानती की अपेक्षा एक जमानती पेश करने का निर्देश दिया।
जून को हुई सुनवाई में शहनाज की ओर से पेश वकील ने कहा कि मार्च के आदेश की शर्त में और संशोधन की जरूरत है क्योंकि वह जमानत देने में असमर्थ हैं। इसलिए अनुरोध किया गया कि उसे बिना किसी जमानत के केवल निजी मुचलके पर रिहा किया जाए।
अदालत ने कहा उनका विचार है कि एक बार निलंबन का आदेश पारित हो जाने के बाद आवेदक को अपने वास्तविक अक्षर, भावना और इरादे में इसके लाभ का हकदार होना चाहिए। स्वतंत्रता का हर दिन मायने रखता है और आवेदक को जेल में रहने के लिए नहीं बनाया जा सकता है कि वह जमानत नहीं दे सकी।
अदालत ने महिला को राहत प्रदान करते हुए उसे 10 हजार रुपये के निजी मुचलके पर रिहा करने का निर्देश दिया है। अदालत ने महिला को सप्ताह में दो बार यानि सोमवार और गुरुवार को निकटतम स्थानीय पुलिस स्टेशन गाजियाबाद में रिपोर्ट करने व अपना मोबाइल नंबर जांच अधिकारी को देने का भी निर्देश दिया है।