200 से लेकर 1000 रुपये में पूरी चकरी
पतंग उड़ाने वाले कहते हैं कि चीन का मांझा प्लास्टिक का होता है। मजबूत होने के कारण पतंग कम कटती हैं। ज्यादा दूर तक पतंगों के जाने पर डोर टूटने का डर नहीं होता है। दुकानदारों से मजबूत और अच्छा मांझा मांगने पर ज्यादातर दुकानदार चीन का मांझा सस्ता होने की वजह से दे देते हैं। वहीं दुकानदारों का कहना है कि बचत अच्छी होती है। 200 से लेकर 1000 रुपये में पूरी चकरी आ जाती है। इस चकरी में से मांग के आधार पर मांझे की बिक्री की जाती है।
जांच का विषय है कि देशी मांझा है या चीनी
फेडरेशन ऑफ सदर बाजार ट्रेडर्स एसोसिएशन के चेयरमैन परमजीत सिंह पम्मा कहते हैं कि चीनी मांझे पर तो पूरी तरह प्रतिबंध है लेकिन देशी मांझे को भी चीन की तरह ही निर्मित किया जा सकता है। मांझे पर भले ही प्रतिबंध है, लेकिन नायलॉन वाले धागे पर नकल करके चीन की तरह ही मांझे बनाए जा सकते हैं। लिहाजा यह जांच का विषय है कि मांझा किस तरह का है। जो भी चीनी मांझे की बिक्री कर रहा है उस वजह से सभी व्यापारी बदनाम होते हैं। कई लोग देशी मांझे को ही चीनी मांझा कहकर बिक्री कर देते हैं।
चीनी मांझे पर सख्ती बेहद जरूरी
दिल्ली व्यापार महासंघ के अध्यक्ष देवराज बावेजा का कहना है कि चीनी मांझे पर सख्ती बेहद जरूरी है। जिस घर का सदस्य इस मांझे का शिकार होता है वहीं इसका दर्द समझ सकता है। पंद्रह अगस्त आते ही दुर्घटनाएं शुरू हो जाती हैं। इस पर सख्ती होनी चाहिए। स्त्रोत पर रोक लगनी चाहिए ताकि किसी तक यह मांझा पहुंच नहीं सके।
पुलिस को सक्रिय होने की जरूरत
सदर निष्काम वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष हरजीत सिंह छाबरा कहते हैं कि सरकार को सख्ती बरतने की आवश्यकता है। पुलिस जब तक सक्रिय नहीं होगी तब तक रोक मुश्किल है क्योंकि जो चीजें बैन होती हैं, उसे उतना ही पसंद किया जाता है। जिस इलाके में इस तरह के मांझे बिकते हैं वहां सख्ती होनी चाहिए।
कुछ व्यापारी नाम नहीं बताने की शर्त पर बताते हैं कि लाल कुआं में सबसे अधिक इस तरह के मांझे बिकते हैं, अगर वहां सख्ती हो जाए तो दिल्ली में चीनी मांझे का स्त्रोत ही खत्म हो जाए। कंटेनर में छिपाकर इस तरह के धागे चीन से भारत में आते हैं।