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सियासी मोहरा बन रहा दिल्ली नगर निगम: कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा ने अपने हक में भुनाया

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 23 Mar 2022 10:53 PM IST

सार

भाजपा नेताओं को इस बात की आशंका सता रही है कि इस बार दिल्ली नगर निगम में पार्टी का 15 साल पुराना किला ढह सकता है। इस हार को कम करने के लिए भाजपा ने केंद्रीय नेतृत्व को निगमों के एकीकरण करने का सुझाव दिया। इस नीति पर चलते हुए ही केंद्र सरकार ने कैबिनेट मीटिंग में निगमों को एक करने का रास्ता साफ कर दिया...
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दिल्ली नगर निगम - फोटो : Agency (File Photo)


शीला दीक्षित ने कांग्रेस मुख्यमंत्री के रूप में दिल्ली पर लगातार 15 वर्ष तक राज किया। उनके शासनकाल में दिल्ली में खूब विकास कार्य हुए। दिल्ली झुग्गी-झोपड़ियों से मुक्त हुई और लंबी-चौड़ी सड़कों, बड़े-बड़े फ्लाईओवरों ने न केवल दिल्ली के लोगों की जिंदगी आसान की, बल्कि इसकी खूबसूरती में भी चार-चांद भी लगाए। लेकिन इतना विकास कार्य करने और दिल्ली विधानसभा में बड़े बहुमत से जीतने के बाद भी वह दिल्ली नगर निगम में जीत हासिल नहीं कर पाई।

शीला दीक्षित ने ऐसे निकाला तोड़

शीला दीक्षित सरकार के लिए यह मुंह चिढ़ाने वाली बात थी कि जिस दिल्ली में उनकी तूती बोलती है, उसी दिल्ली के नगर निगम में पूरी ताकत लगाने के बाद भी वह सत्ता तक नहीं पहुंच पा रही थी। शीला दीक्षित ने इसका तोड़ निकाला। पहले तो उन्होंने कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार से एमसीडी के नियमों में फेरबदल करवाकर नगर निगम के कामकाज में हस्तक्षेप करने का गुप्त दरवाजा खोज लिया, तो बाद में, इससे भी बात न बनने पर, दिल्ली नगर निगम को तोड़कर तीन हिस्सों –पूर्वी दिल्ली नगर निगम, उत्तरी दिल्ली नगर निगम और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम में बांटने का प्रस्ताव कर दिया।



तत्कालीन केंद्र सरकार ने कांग्रेस के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर नगर निगमों के तीन फाड़ कर दिए। उस समय भाजपा ने निगमों को तोड़ने का विरोध किया था। हालांकि, निगमों के टूटने के बाद भी कांग्रेस की हालत नगर निगमों में नहीं सुधरी। तीनों नगर निगमों के अलग-अलग चुनाव होने के बाद भी भाजपा तीनों नगर निगमों में बड़ी जीत हासिल करने में कामयाब रही।

अब भाजपा उसी रास्ते पर

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की प्रचंड ताकत से सरकार बनने के बाद दिल्ली सरकार और नगर निगमों की लड़ाई सड़क पर आ गई। आए दिन नगर निगम कर्मचारी वेतन न मिल पाने के कारण हड़ताल करने लगे और निगम का कामकाज प्रभावित होने लगा। जगह-जगह कूड़े का अंबार लगने लगा। आम आदमी पार्टी ने इस कुशासन के लिए भाजपा को दोषी ठहराया और निगमों में भ्रष्टाचार होने का आरोप लगाया, तो भाजपा का आरोप रहा कि दिल्ली सरकार निगमों को फंड नहीं दे रही है, जिससे निगम के कामकाज में बाधा आ रही है।



आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज बार-बार यह कहते रहे कि निगमों का दिल्ली सरकार पर कोई बकाया नहीं है। यदि केंद्र सरकार चाहे तो वह सीधे निगमों को फंड देने की नीति बना ले जिससे दोनों के बीच कोई विरोध न रह जाए।


मनोज तिवारी ने दिल्ली भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए ही तीनों नगर निगमों को मिलाकर एक करने और निगम का फंड केंद्र सरकार से सीधे निगमों को देने का प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा था। इस मुद्दे पर लंबे समय से बात चल रही थी। लेकिन इसी बीच दिल्ली की जनता ने निगम में भाजपा तो विधानसभा में आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया। 2015 और 2020 में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत लगाई, लेकिन इसके बाद भी वह अरविंद केजरीवाल का किला भेदने में नाकाम रही।

भाजपा को 15 साल पुराना किला ढहने का डर

चर्चा है कि भाजपा नेताओं को इस बात की आशंका सता रही है कि इस बार दिल्ली नगर निगम में पार्टी का 15 साल पुराना किला ढह सकता है। इस हार को कम करने के लिए भाजपा ने केंद्रीय नेतृत्व को निगमों के एकीकरण करने का सुझाव दिया। इस नीति पर चलते हुए ही केंद्र सरकार ने कैबिनेट मीटिंग में निगमों को एक करने का रास्ता साफ कर दिया।



लेकिन इसी बीच यह सच्चाई है कि निगमों का एकीकरण प्रशासनिक कारणों से कम और राजनीतिक कारणों से ज्यादा किया जा रहा है। इसका चुनावों पर कितना असर पड़ेगा, यह तो तभी पता चलेगा जब नगर निगम चुनाव होंगे, लेकिन फिलहाल, माना जा रहा है कि इस प्रक्रिया के शुरू होने के बाद निगम चुनाव कम से कम नवंबर-दिसंबर तक के लिए टल गए हैं।


अनुमान है कि नए मॉडल में एकीकृत नगर निगम का ढांचा इस प्रकार का बनाया जा सकता है, जिसमें पूरा कामकाज एक प्रशासनिक समिति के द्वारा होगा। इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार और जनता के कुछ प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो दिल्ली के मुख्यमंत्री के समकक्ष कमिश्नर का एक और पद सृजित हो जाएगा, जो केजरीवाल के एकछत्र शासन को परोक्ष रूप से चुनौती देता रहेगा।

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