हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी द्वारा जमानत के मामलों में समय पर स्थिति रिपोर्ट दाखिल न करने पर चिंता जताई है। अदालत ने कहा इस प्रकार की देरी से किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित होती है। अदालत ने संबंधित पुलिस उपायुक्त को निर्देश दिया कि वे व्यक्तिगत रूप से मामलों को देखें यदि जरूरी हो तो संबंधित अधिकारी पर जुर्माना भी लगाया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी गुरुवार को सुमेर व एक अन्य मामले की सुनवाई करते हुए कहा अदालत ने पहले भी अभियोजन एजेंसियों को स्थिति रिपोर्ट समय पर दाखिल करने के पहलू पर फैसला सुनाया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसमें कोई देरी न हो। इसके बावजूद जांच अधिकारी ऐसा नहीं कर रहे।
एपीपी हिरेन शर्मा ने कहा कि ऐसे मामलों में पर्यवेक्षण करने वाले एसएचओ पर कुछ जुर्माना लगाया जा सकता है ताकि सिस्टम में कमी को ठीक किया जा सके। न्यायमूर्ति ओहरी ने उनके तर्क पर पुलिस उपायुक्त से कहा यह आपके स्तर पर तय होना है कि प्रक्रिया को कैसे सुव्यवस्थित किया जाए चाहे संवेदनशील बनाकर या दंडात्मक कार्रवाई द्वारा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह एक चेतावनी भी है।
मामले में पेश संबंधित डीसीपी से कहा बार-बार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि स्थिति रिपोर्ट समय पर अदालत में पहुंचे ताकि जमानत आवेदनों पर सुनवाई हो और उन्हें अनावश्यक रूप से स्थगित न किया जाए।
स्थिति रिपोर्ट दाखिल न होने से व्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित होती है
अदालत ने कहा स्थिति रिपोर्ट दाखिल न करने से व्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित होती है। मुझे यह देखकर दुख होता है कि सभी वरिष्ठ अधिकारियों, एपीपी के प्रयास करने के बावजूद स्थिति रिपोर्ट समय पर अदालत में नहीं पहुंच रही। ऐसी रिपोर्ट सुनवाई की तारीख या एक दिन पहले सौंप दिया जाना चाहिए। एक बार जब स्थिति रिपोर्ट को एक महीने के भीतर या अदालत के पास तारीखों की उपलब्धता के अनुसार दायर करने का निर्देश दिया जाता है, इसे अंतिम तिथि पर ही क्यों दायर किया जाता है?
न्यायमूर्ति ओहरी ने कहा, वे समझते हैं कि कार्यबल जबरदस्त दबाव में है, लेकिन दोनों मामलों में आदेश, हाईकोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं कि क्या अनुपालन किया जाना है। अधिकांश समय आदेश एक या दो दिन में अपलोड किए जाते हैं। आपके पास अगले सप्ताह आने वाली तारीखों की सूची है ताकि आप इस सप्ताह या इस महीने सुधारात्मक उपाय कर सकें।